दुक्खम्‌-सुक्खम्‌

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[size=150:2d8vfihs][color=#0000FF:2d8vfihs] दुक्खम्‌-सुक्खम्‌
(उपन्यास)
ममता कालिया

उसके जन्म में ऐसी कोई असाधारण बात नहीं थी कि उसका जिक्र इतिहास अथवा समाजविज्ञान की पुस्तकों में पाया जाता। जिस दिन वह पैदा हुई, घर में कोई उत्सव नहीं मना, लड्डू नहीं बँटे, बधावा नहीं बजा। उलटे घर की मनहूसियत ही बढ़ी। दादी ने चूल्हा तक नहीं जलाया। लालटेन की मद्धम रोशनी में सिर पर हाथ रखे वे देर तक तख्तत पर बैठी रहीं। बेटे की बेटी के लिए उनके मन में अस्वीकार का भाव था। जिस कोठरी में वे बैठी थीं, उसकी पिछली दीवार के सहारे गेहूँ और उड़द की बोरियाँ शहतीर तक चिनी रखी थीं और वे सोच रही थीं, एक मुँह लीलने को और बढ़ गया, पहले कौन कम थे। उन्हें बड़े तीखेपन से अपनी तीनों बेटियों का ध्यान आया जिनके रहते वे कभी चैन से बैठ नहीं सकीं। तीनों प्रसूतियों पर उनका दिल किस तरह टूटा, कैसी पराजित हुई थीं वे अपनी सृजनशीलता पर, कैसे उठते-बैठते, ससुराल से लेकर पीहर तक सबने उन्हें ताने मारे थे। लडक़ा था सिर्फ एक और उसके भी हो गयीं दो बेटियाँ।

नहीं, पहली पोती पर वे इस तरह हताश नहीं हुई थीं। शादी के सवा साल बाद जब बहू को अस्पताल ले जाने की नौबत आयी, वे खुशी-खुशी, संग-संग ताँगे पर सवार हो गयीं।

पड़ोस की रामो ने असीस दी, ‘‘जाओ बहू, जल्दी अपने हाथ-पैर से खड़ी वापस लौटो, गोद में कन्हैया खेलें।’’

दादी ने बात काटी, ‘‘कन्हैया हो या राधारानी, री रामो, मेरे बेटे के पहलौठे को टोक न लगा।’’ जब अस्पताल में पाँच दिन की प्रतीक्षा और प्रसव-पीड़ा के पश्चात् वास्तव में राधिकारानी ही गोद में आयी तो दादी ने सबसे पहले रामो को कोसा, ‘‘चलते-चलते टोक लगाई ही। चलो इससे क्या। मेरे बेटे का पहला फल है। अरी ओ भग्गो कहाँ है थरिया, ला नेक गाना-बजाना हो जाए। लच्छमी पधारी हैं।’’

टन टनाटन टन, थाली अस्पताल में ही बजी थी। लीला और भग्गो उस छोटे-से कमरे में मटक-मटककर नाचीं। दादी ने अपनी दानेदार आवाज़ में सोहर गाया, ‘‘बाजो बाजो बधावा आज भई हैं राधारानी।’’ बेबी की छठी पर इक्कीस कटोरदान बाँटे गये थे।

बेबी थी भी बड़ी सुन्दर, गोरी भभूका। किसी दिन अगर काली बोस्की की फ्रॉक उसे पहना दी जाती, झट नज़र लग जाती। शाम तक वह दूध को मुँह न लगाती। तब दादी लोहे की छोटी डिबिया से फिटकरी का एक टुकड़ा निकालकर, जलते कोयले पर रखतीं। फिटकरी पिघलकर मुड़-तुड़ जाती। दादी बतातीं, ‘‘जे देख, है न बिल्कुल रामो की शक्ल, यह उसका सिर, यह धोती का पल्ला और यह उसका हाथ।’’ सबको वाकई फिटकरी में रामो नज़र आने लगती। सब बारी-बारी से उसे चप्पल से पीटते। कभी-कभी तब भी बेबी दूध न पीती। तब दादी पड़छत्ती पर पड़ा लोहे का कंडम चाकू उतारतीं, उसे चूल्हे में तपातीं। जब वह लाल सुर्ख दहकने लगता उसे कटोरी के दूध में थोड़ा-सा छुआ देतीं। चाकू छन्न से बोलता। दादी उँगली से तीन बार दूध के छींटे बाहर को छिडक़तीं। बेबी दूध पीने लगती।

लेकिन इस बार दादी के हौसले टूट चुके थे। उन्हें लग रहा था बहू ने नौ के नौ महीने उन्हें धोखे में रखा। कितनी बार उन्होंने इन्दु से पूछा, ‘‘मोय सच्ची-सच्ची बता दे या दिना तेरा जी मीठा खाय को करे कि नोनो।’’

इन्दु सकुचाती हुई चीनी की ओर इशारा कर देती, हालाँकि उसकी तबीयत हर समय खटमिट्ठी और नमकीन चीज़ों पर मचलती रहती। तमाम सीधेपन के बावजूद इन्दु अपनी ख़ैरियत पहचानती थी। कहीं असली स्वाद वह बता देती तो सास उसे सूखी रोटी को तरसा देती। फिर चटपटी चीज़ें तो उसे हमेशा से पसन्द थीं, शादी से पहले भी।

एकाध बार दादी ने उसका पेट उघाडक़र देखने की कोशिश की पर इन्दु ने शर्म के मारे करवट बदल ली। दादी का यक़ीन था कि नाभि से निकली रोम-रेखा अगर सीधी ढलान उतरती जाए तो बेटा होता है अन्यथा बेटी।

इन्दु की यह छोटी बेटी कोई यों ही नहीं हो गयी थी। ईसाई डॉक्टरनी ने पेट चाक कर उसे गर्भ से निकाला था। हुआ यह कि बच्चा पहले तो ठीक-ठीक उतरता रहा फिर उसका सिर फँस गया। डॉक्टरनी बेहद दक्ष थी। उसने हल्के औज़ारों से शिशु को अन्दर धकेला। बड़ी नर्स ने आनन-फानन, एक कागज़ पर, दादी के अटपटे दस्तख़त लिये और डॉक्टरनी ने ऑपरेशन-थिएटर में इन्दु की नाक पर क्लोरोफॉर्म की काली कीप रख दी। पास में बैठे एक आदमी ने दादी को बताया कि उनसे किस कागज़ पर दस्तख़त लिये गये हैं तो उनका कलेजा हौल गया, ‘‘हाय जो बहू को कुछ हो गया तो सारी दुनिया मोय नाम धरेगी। बंसीवारे राखो लाज, बंसीवारे राखो लाज।’’ जितनी देर ऑपरेशन थिएटर की लाल बत्ती जली रही दादी यही मनाती रहीं, ‘‘हे गोपालजी मेरी बहू की रच्छा करना।’’

दरवाज़ा खुलने पर सहसा अन्दर से बच्चे के रोने की आवाज़ आयी। दादी का दिल दूसरी बार हौल गया। उन्हें लगा यह किसी पुरुष कंठ का रोदन नहीं है। उनका भय सच था। तभी हाथों से दस्ताने उतारती, डॉक्टरनी बाहर आयी और बोली, ‘‘अम्मा मुबारक हो, पोती हुई है।’’

दादी का चेहरा पीला पड़ गया। अब तक ऑपरेशन-थिएटर के दरवाज़े से सटी खड़ी थीं, अब धम्म से बेंच पर बैठ गयीं। उनकी आँखों के आगे अँधेरा छा गया, हलक में आँसुओं का नमक महसूस हुआ। उनकी छोटी लडक़ी भगवती साथ आयी थी। वह भी माँ की हालत देख रुआँसी हो गयी जैसे इसमें उसका भी कोई दोष रहा हो। धीरे-धीरे दादी की चेतना लौटी। वे उठकर अस्पताल के फाटक के बाहर निकल आयीं, ताँगा तय किया और भग्गो के साथ वापस मथुरा लौट चलीं। वृन्दावन से इतनी निराश वह पहली बार लौटी थीं।

सतघड़े के उस मकान में अँधेरा तो वैसे ही बहुत रहता था, आज कुछ ज्या दा घना हो गया। लालटेन की रोशनी में भग्गो की लम्बी परछाईं देखकर दादाजी ने डपटा, ‘‘कहाँ ऊँट-सी घूम रही है, बैठ चुपचाप एक कोने में।’’

दादी किचकिचाईं, ‘‘बहू का गुस्सा बेटी पर निकार रहे हो, कौन मेल के बाप हो तुम।’’

लाला नत्थीमल का क्रोध पत्नी की तरफ़ घूम गया, ‘‘तुमने का कम लाइन लगाई थी छोरियों की।’’

‘‘हाँ मैं तो दहेज में लायी थी ये छोरियाँ, तुम्हारी कछू नायँ लगैं।’’

नत्थीमल ने आँखें निकालकर पत्नी को घूरा और फिर खाँसते हुए आढ़त की तरफ़ चल दिये।[/color:2d8vfihs][/size:2d8vfihs]

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