वह अजनबी

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वह अजनबी

"जब भी ये दिल उदास होता है .." गाना बज रहा था ऍफ़ एम पर और रिया महसूस कर रही थी एक उदासी को जो पसर रही थी उसके मन में .एक आत्मीय जिसको उसने कभी देखा नहीं, उसे खो देने का एहसास भारी कर दे रहा था उसके मन को, आत्मा को..उलझ गयी थी रिश्तों के तानोबानो में.. सोचें ३ साल पहले की उस रोंग नंबर कल पर जा रुकी जिसने उसे एक ऐसे रिश्ते से जोड़ दिया था जिसका कोई नाम नहीं था ..एक अजनबी अचानक उसकी ज़िन्दगी में आया और दुनियावी रिश्तों से परे एहसास के रिश्ते का आभास करा कर चला गया ..

यादों की परतें खुलने लगी ..रिया को वो सब याद आने लगा जो कहीं उसके मन की गहराई में दबा पड़ा था ..वो शख्सियत जिसको उसने कभी अहमियत नहीं दी थी, आज अचानक उसी के लिए वो आंसू बहाएगी… यह उसने कभी सोचा तक नहीं था ..

"राज"..यही नाम बताया था उसने जब पहली बार गलती से फ़ोन मिल गया था ..और उसके बाद उसकी ओर से दोस्ती की पेशकश.. और रिया का ये कह कर ख़ारिज कर देना की वो अजनबियों से दोस्ती नहीं करती ..फिर उसका बार बार कॉल करके ये विश्वास दिलाना की वो खुद को अजनबी नहीं महसूस करता ..धीरे धीरे रिया के दिल में एक कोमल भाव उत्पन्न कर गया उसके लिए.. रिया संवेदनशील थी.. भावनाओ को समझने वाली पर खुद में बहुत पारदर्शी भी ..अपनी भावनाओं को भी अच्छी तरह जानने वाली ..राज ने उसे एकतरफा प्रेम किया और रिया ने उसकी भावनाओ का सम्मान किया ..इससे ज्यादा दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं था ..रिया ने उसे स्नेह करुणा.ममत्व दिया पर प्रेम वो उसे नहीं दे सकी.

दोनों में सबसे बड़ा अंतर जीवन के प्रति प्रेम का ही था ॥राज की हर बात में मायूसी झलकती थी तो रिया की हरबात में जीवन जीने की उमंग ..राज की दुनिया जैसे रिया तक सिमट कर रह गयी थी.. अपने जीवन का हर दुःख वो उससे बाँट लेना चाहता था ..और रिया सुनती रहती थी .. तभी उसने ये जाना की वो एक अच्छी श्रोता भी है..अभी तक उसे एक अनियंत्रित वक्ता के रूप में सब चिढाते थे ..पर संवेदनाओं से भरा उसका मन राज को उसके अंतस में भरे अवसाद को बहाने के लिए एक श्रोता बना चुका था ।आधे आधे घंटे वो बिना एक शब्द बोले राज को सुनती रहती थी ..राज को उसका साथ ..तपती दोपहर में ठंडी छाँव सा लगता था ..प्रेम को तरसता उसका मन रिया से उम्मीद लगा बैठा था प्रेम की.

पर प्रेम सोच समझ के तो होता नहीं..वो तो बस घटित हो जाता है.. और रिया के मन में करुणा थी पर प्रेम का कोई स्पंदन उसे महसूस नहीं होता था .. और यूँ राज का एकतरफा प्रेम खुद राज के लिए जीने की उमंग बन चुका था उसने रिया से बेशर्त प्यार किया था ..उसने सिर्फ इतना चाहा था कि वो रिया से बात करता रह सके..और प्रेम का सम्मान करने वाली रिया ने भी उसे निराश नहीं किया ..और फिर अचानक उसके फ़ोन आने बंद हो गए.. कुछ दिन यह सब रिया के खयाल में रहा फिर वो उसे भी एक सपना समझ भूलने लगी..दुनिया में ऐसे कितने लोग होते हैं जो समय काटने की खातिर ऐसे प्रेम का इज़हार करते हैं..रिया इस बात पर यकीन करना चाहती थी की राज भी उन्ही में से एक था..पर उसका दिल नहीं मानता था..करीब ६ महीने बीत गए थे कि अचानक एक दिन फिर किसी अजनबी नंबर से फ़ोन कॉल आई ..और फ़ोन करने वाला कोई और नहीं राज था ..रिया तो लगभग भूल चुकी थी उसे..कुछ रहस्यमय सा लगा उस रोज़ राज उसे.. एक नयी जिद पकड़ ली थी उसने .. मिलना है .. सामने बैठ कर बात करनी है.. और रिया सामाजिक बन्धनों में जकड़ी.. साफ़ मना कर बैठी..आत्मिक जुडाव होना अलग बातहै..पर मिलना जुलना किसी अजनबी से.. ये तो उसके संस्कारों में नहीं था ..उस समय तक वह नहीं जान पायी थी कि इस जहाँ में कौन अजनबी है और कौन आत्मीय..सब कुछ तो परिभाषाओं के तहत झूठ ही हो जाता है …और राज का यूँ कहना कि "तुम मिल लो मुझसे वरना बाद में पछताओगी "..उसे एक गर्वौन्मत कथन लग रहा था उसने भी बड़े गर्व से कह डाला था, "नहीं,मैं कभी मिलना नहीं चाहूंगी तुमसे.."

उसके बाद राज के फ़ोन अक्सर ३-४ महीने के अंतराल पर आने लगे॥रिया पूछती थी कि वह कहाँ है? उसकाजवाब होता, किसी दूर-दराज़ इलाके में हूँ, वहां फ़ोन नहीं है जब शहर आता हूँ तो दोस्त के फ़ोन से बात करता हूँ.. रहस्यमय सी बातें और साथ साथ ये कि तुम हर पल साथ होती हो..मुझे जीवन जीने का हौसला देती हो.. तुम्हें देखता रहता हूँ …रिया ने पूछा देखते रहते हो ..कैसे?? तो राज ने कहा " लाल बोर्डर कि पीली साड़ी ..माथे पे गोल बड़ी बिंदी और खुले बाल ..एक दम देवी का स्वरुप "

भीग जाता था रिया का मन.. राज के पवित्र एहसासों पर ..वो उसे समझाना चाहती थी कि ये उसके स्वयं के एहसास हैं.. उसमें रिया का कुछ भी नहीं.. पर राज कि कोमल भावनाओं को क्षति पहुंचाए बिना ये वो उसे नहीं समझा सकती थी ..धीरे धीर रिया ने सब समय पर छोड़ दिया था ..ऐसे ही करीब १.३० साल बीत गया .. हर ३-४ महीने में राज का फ़ोन आता और वो उससे मिलने कि गुजारिश करता ..और मना कर देने पर एक ही बात कि एक दिन आएगा जब तुम मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "..

सोचते सोचते रिया कि आँखों से आंसू झर रहे थे … राज के कहे हुए शब्द गूँज रहे थे उसके कानो में, उसके अंतर्मन में….कहा करता था वो " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है "…. झूठ !!.. झूठ कहता था वो.. कहाँ डाल पायी वो जान एक जिंदा इंसान के भी एहसासों में.. पल पल टूटता रहा वो और एहसास भी नहीं होने दिया ..रिया को अपनी सारी जीवन्तता झूठ लगने लगी.. उसकी तस्वीर को सामने रख वो किसी एकांत स्थल पर जूझता रहा ब्रेनट्यूमर से अकेले ..इस कोशिश में कि जाने से पहले इतना कमा जाए कि उसके परिवार को कोई परेशानी ना हो ..उसका परिवार ..जिसमें एक अपने में डूबी पत्नी और दो छोटे बच्चे .. जिनके लिए वो जीना चाहता था ..पत्नी के लिए उसने रिया को बताया था कि बहुत प्रक्टिकल है..भावनाएं किसी के लिए भी नहीं है यहाँ तक कि उसके अपने माता पिता के लिए भी नहीं.. और राज .. ज़रुरत से ज्यादा भावुक इंसान.. कभी कभी लगता है इश्वर के घर से जोड़ियाँ कैसे बन के आती हैं? इन्ही को शायद ऋण बंधन कहते हैं …

रिया को याद है कि एक बार जब उसके यही कहने पर कि मैं नहीं मिलूँगा जब तुम चाहोगी..वो उससे जिद कर बैठीथी कि ऐसा क्यूँ कह रहे हो..तब उसने बताया था कि पिछले २ साल से वो इसीलिए भाग रहा है.. ज़िन्दगी बहुत कम बची है ..जितनी बची है उसे उसके बाद जीने वालों के आराम के लिए इस्तेमाल कर रहा है

स्तब्ध रह गयी थी रिया ॥उसी पल उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो इस जाने वाले इंसान कि एक दिली इच्छा तो वो पूरी कर ही सकती है.. वो उससे मिलेगी ..चाहे उसे संस्कारों को छोड़ना पड़े ..समाज के नियमों को तोडना पड़े..पर एक ऐसे इंसान कि इच्छा वो ज़रूर पूरी करेगी जिसने उसे निस्वार्थ प्रेम किया है ..और उसने उससे कहा कि अगली बार वो जब भी अपने शहर आये तो उसे बता दे वो कोशिश करेगी उससे मिलने आने की।

पर सोच को हकीकत में बदलना एक भरे पूरे घर की जिम्मेदार गृहणी के बस में नहीं होता .. दुनियावी रिश्ते कभीकभी आत्मीय रिश्तों की राह में बाधा बन जाते हैं..समय बीतता गया ..हर ३-४ महीने में राज का एक छोटा सा कॉल आ जाता था ..उसकी बीमारी अब खुल कर सामने आ चुकी थी .परिवार वाले हर संभव कोशिश कर रहे थे उसके इलाज की.आर्थिक ,सामाजिक जो भी सहारा उसे अपने दुनियावी रिश्तों से मिल सकता था वो मिल रहा था पर एक भावुक इंसान को जो मानसिक सहारा चाहिए वो उसे नहीं मिल पा रहा था और उसी की चाह में वो किसी भी तरह रिया को फ़ोन करता था . और एक दिन उसने कहा कि जब ये कॉल भी आना बंद हो जाए तो जान लेना की मैं अब दुनिया में नहीं हूँ…टीस सी होती थी रिया के दिल में ..लेकिन बस उसी समय तक जब तक उससे बात होती थी.. उसके बाद रिया अपनी दुनिया में मस्त हो जाती थी.. सोचते सोचते रिया को खुद से नाराज़गी सी होने लगी.. "सहानुभूति के तौर पर भी तू क्यूँ नहीं सोच पायी उसके बारे में कितनी खुदगर्ज़ हो गयी थी .." जैसे रिया कि आत्मा उसे धिक्कार रही हो सामने खड़ी.. " बहुत खुशनुमा बनती है .. सब कहते हैं हर समय हंसती रहती है ..क्या कर पायी तू उसके लिए .. बीमारी तो एक बहाना थी.. तूने उसे इतना भी साथ नहीं दिया कि वो बाहर आ पाए उस अवसाद से जिसमें घिर कर उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया " …फूट फूट कर रो पड़ी रिया …..उसके इलाज के लिए USA जाने का पता उसके दोस्त के द्वारा लगा था रिया भी दोस्त के मार्फ़त उसके हाल चाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेती थी

लौट के आने के बाद एक बार राज से बात हुई ।उसने बताया की एअरपोर्ट से बाहर आते ही मेरे दोस्त ने सबसे पहली न्यूज़ ये दी की तुम्हारा अक्सर फ़ोन आता रहा इस बीच मेरे बारे में पूछने को॥ कितनी ख़ुशी झलक रही थी उसकी आवाज़ में ..उसी से रिया ने उसके रेगिस्तान से तपते मन का अंदाज़ा लगा लिया की उसकी करुणा की कुछ फुहारें भी राज के मन को कितना शीतल कर गयी.. उसने पूछा की कैसा लगा ये जानना ..तो राज ने कहा -" मुझे उम्मीद थी की तुमने पूछा होगा ..इतना तो जानता हूँ तुम्हें.."

रिया को राज ने बताया की उसे ब्रेन ट्यूमर का अटैक कभी भी आ जाता है इसलिए वो अपने साथ फ़ोन नहीं रख सकता ..और जब कभी उसका दोस्त उससे मिलने आता है और वो अकेले होते हैं तभी वो कॉल कर सकता है.. धीरेधीरे ठीक हो रहा है.. कुछ दिनों में ऑफिस ज्वाइन कर लेगा ..ख़ुशी हुई रिया को जान कर .. उसके लिए मन से दुआ करी और फिर वक़्त गुजरने लगा अपनी गति से..पिछले ६ महीने से राज कि कोई खबर नहीं थी और इस बार जब उसने दोस्त को कॉल किया तो पता चला कि राज तो चला गया …संभावित सूचना थी इसलिए रिया को धक्का तो नहीं लगा ..बस उसने इतना कहा लेकिन वो तो ठीक हो रहा था ना..ट्रीटमेंट के बाद .. तो दोस्त ने बताया कि उसने तो suicide कर लिया… रिया पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो.. ऐसा क्या हुआ ..इतना बड़ा कदम उफ़ !!!!!

जो सुना उसको सुन कर उसे दुनियावी रिश्तों के खोखलेपन पर विरक्ति सी हो आई.क्यूँ परिभाषाओं के सामने भावनाएं गौण हो जाती हैं..राज के मन को उसके साथ रहने वाले क्यूँ जान नहीं पाए …राज के दोस्त ने बताया कि उसकी तबियत को ले कर परिवार वाले उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे .अकेले से पड़ गए थे वो .उनको लगने लगा था कि मैं अब किसी के काम का नहीं रहा ..बोझ बन गया हूँ सब पर.. तो जब जाना ही है तो कुछ दिन महीने या साल का इंतज़ार क्यूँ करूँ.. सबको मुक्ति दे दूँ इस अनचाहे बोझ से.. और एक दिन उन्होंने फंदा लगा केअपनी जीवन लीला समाप्त कर दी……"

……..स्तब्ध सी रिया ..कुछ बोल भी नहीं पायी.. सुन्न सी बैठी रह गयी.. उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके जीवन से जुड़ा कोई इंसान इतना कमजोर भी हो सकता है .. सबसे ज्यादा गुस्सा उसे खुद पे आया .. क्या कर पाई वो उसके लिए.. क्यूँ भेजा था इश्वर ने उसकी ज़िन्दगी में उसे.. वो उसकी एक छोटी सी इच्छा भी तो पूरी नहीं कर पायी इतनी सक्षम भी नहीं हो पायी कि कुछ हँसते हुए पल किसी मरते हुए इंसान कि झोली में डाल दे.. और आंसू बहते रहे ..उस इंसान के लिए जिसके प्रेम को उसने कभी अहमियत नहीं दी.. आज उसकी वही आवाज़ गूँज रही थी कानों में " तुम मुझसे मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "

और जिस इंसान को उसने कभी देखा भी नहीं था .ज़हन कि दीवारों पर उसकी एक परछाई सी उभर आई ॥साक्षात्मोहब्बत का अक्स हो जैसे..

और रिया बुदबुदा उठी.. " मैं तो तुमको कुछ नहीं दे पायी राज ..पर तुम मुझे सिखा गए कि प्रेम क्या होता है तुम्हारी पाक मोहब्बत को दिल से दुआ देती हूँ.. जहाँ हो .. खुश रहो.. और उस निस्वार्थ प्रेम को अपनी रूह में बसाकर फिर दुनिया में आओ.. और इस दुनिया को प्रेम करना सिखाओ.. परिभाषाओं से ऊपर उठ कर प्यार किसे कहते हैं ये तुम्ही से जाना ..जीवन का एक अध्याय पढ़ा गए तुम ..और मेरे दिल में अपने लिए एक कोना सुरक्षित कर ही लिया तुमने.. आखिर अपनी जिद के पक्के निकले ना " कहते कहते रिया रोते रोते भी मुस्कुरा पड़ी…और अब रिया जब भी हंसती है तो ये वाक्य गूँज जाता है उसके कानो में " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है " ……..

काश ये सच होता !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

वह अजनबी उसे मुहब्बत का पहला सबक सिखा गया था…

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