मुंबई से भूसावल तक

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[size=150:17u3ww94][color=#0000BF:17u3ww94]मुंबई से भूसावल तक–1

परेश जोशी एक 45 साल का हॅटा कटता मरद था. लंबा कद, गुलाबी गोरा रंग और
भारी मून्छे उसके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बनाती थी. जब वह 22 साल का
था तब उस’का प्यार एक लड़’की से हुवा था पर उस लड़’की ने अप’ने घर वालों
के दबाव में आकर घरवालों की मर्ज़ी से दूसरी जगह शादी कर ली. इस घट’ना से
परेश का दिल इत’ना टूटा की उसे औरत जात से नफ़रत हो गई. उस’ने जिंद’जी
में कभी भी शादी ना कर’ने की कसम खाली जिसे वह अब तक निभा रहा है. आज वह
एक लॅडीस गारमेंट्स बनाने की फॅक्टरी में सेल्स मॅनेजर है, अच्छी तनख़ाह
है और मौज मस्ती से रहता है.

वैसे तो इन वर्षों में कई औरतें और लड़’कियाँ उस’की जिंद’गी में आई पर वह
किसी का ना हो सका. होता भी कैसे उसे तो औरत जात से नफ़रत थी. हर औरत या
लड़’की उसे केवल वासना शांत करने का एक खिलौना जान पड़’ती. वह जो भी औरत
या लड़’की उसके बिस्तर में आती उसे बूरी तरह से जॅलील कर अप’नी घृणा
प्रदर्शित करता और उस’से बहशीपन दिखाते हुए अप’नी वासना मनचाहे ढंग से
शांत करता. उस’के इसी रवैये से बेचारी दूबारा उस’के पास भी नहीं फटक’ती
थी. पर अचानक उस’की जिंद’जी में दो औरतें और एक कम’सीन लड़’की एक साथ आ
गई. देखें परेश को उनसे प्यार होता है या ऐसे ही एक बहशी की तरह उन’से
पेश आता है.

वह सेल्स मॅनेजर था सो प्रायः टूर पर जाते रह’ता था. पर वह ज़्यादातर
प्लेन या ट्रेन में एसी क्लास में सफ़र करता था. आज परेश मुंबई सेंट्रल
स्टेशन पर आम मुसाफिरों की तरह खड़ा था जहाँ पाँव रख’ने की भी जगह नहीं
थी और किसी भी कीमत पर रिज़र्वेशन नहीं मिल रहा था. परेश जोशी रह रह के
अपने बॉस को कोष रहा था जिस’ने उसे खड़े पाँव भूसावल जाने का हुक्म दे
दिया था.पर आज की भीड़ देख के उस’के हौस’ले पस्त होने लगे. त्योहारों का
मौसम था और स्टेशन पर ज़रूरत से ज़्यादा भीड़ थी. परेश ने रिज़र्वेशन
ऑफीस में बहुत कोशीष की कि उसे किसी तरह एक सीट मिल जाय पर हर कोशीष
नाकाम’याब रही. ट्रेन के आने में अभी देर थी और वह स्टेशन पर एक जगह खड़ा
ट्रेन का इंत’ज़ार कर रहा था.

परेश जहाँ जनरल बुगी ठहर’ती है वहीं खड़ा ट्रेन के आने का इंत’ज़ार कर
रहा था. तभी उस’के पास एक 17 साल की मस्त जवान लड़’की एक बुड्ढे के साथ
आकर खड़ी हो गई’ शायद उसे भी इसी ट्रेन से कहीं जाना था. ट्रेन के आने
में अभी भी लग’भग 45 मिनिट्स की देरी थी. तभी परेश का ध्यान उस लड़’की की
तरफ चला गया. वह 5’5" की तीखे नाक नक्श की बिल्कुल गोरी एक आकर्षक लड़’की
थी. कमर पत’ली पर स्तन और नितंब भारी थे. मनचले भीड़ का फाय’दा उठा कर
आते जाते उस’की मस्त गान्ड पर अप’ने हाथ ब्रश कर’ते चले जाते पर वह
लड़’की इन सब की परवाह नहीं करते हुए शांत खड़ी थी. शायद मुंबई में रह कर
वह इन सब की आदी थी और शायद नौक’री पेशा लड़’की थी.

उस लड़’की ने क्रीम कलर की कमीज़ और मॅचिंग सलवार पहन रखी थी. तंग सलवार
कमीज़ उस’के बदन के कटाव और उभार साफ दिखा रही थी. परेश पिच्छ’ले 10
मिनिट से उसी लड़’की को निहारे जा रहा था और इस बीच 3 – 4 लोग उसके भारी
नितंबो को छ्छूते हुए चले गये. पर परेश ने देखा कि उस लड़’की ने लोगों की
इस हरक़त पर कोई ध्यान नहीं दिया. वह लड़’की आप’ने साथ आए बुड्ढे से
बातें कर रही थी और तभी वह बुड्ढ़ा एक टीटी को देख कर उस’की और लॅप’का.
अब वह लड़’की अकेली खड़ी थी और परेश ठीक उसके पिछे आ कर खड़ा हो गया और
एक हाथ की हथेली उस’की गान्ड पर रख दी. तभी उस लड़’की ने पिछे मूड के
देखा और परेश बोल पड़ा,

"ऑफ आज तो बड़ी भीड़ है, शायद तुम्हें भी इसी ट्रेन से कहीं जाना है?
कुच्छ तक़लीफ़ तो नहीं ना तुमको बेटी? अरे आरामसे खड़ी रहो, बहुत भीड़
है, संभलके खड़ी रहो मेरे पास, ठीक है?" तब उस लड़’की ने कहा,

"आप कहाँ जा रहे हैं? परेश ने अप’नी हथेली उसी तरह उस लड़’की की गान्ड पर
जमाए रखी और कहा,

"मैं भूसावल जा रहा हूँ. तू चाहे तो मेरे साथ चल. मैं अपने बैठ्ने के लिए
कुच्छ इंतज़ाम करूँगा. तू रहेगी मेरे साथ तो बातें करते चलेंगे? वैसे
मेरा नाम परेश है, तेरा नाम क्या है? वैसे वह बुड्ढ़ा कौन है तेरे साथ
बेटी?"

"अरे अंकल, मुझे भी भूसावल तक ही जाना है. मैं यहाँ अपने मामा के घर आई
थी, नानाजी मुझे ट्रेन मैं बैठाने आए हैं. अब रिज़र्वेशन नहीं है इसलिए
इस जनरल बुगी मैं बैठ्ने रुकी हूँ. मेरा नाम सुरभि मिश्रा है. देखो अगर
नानाजी मेरे लिए सीट लाए तो मैं वहाँ बैठुन्गि नहीं तो आपके साथ
बैठुन्गि. "

"अरे यह तो बहुत ही अच्छी बात है. तुम्हारे जैसी मस्त लड़’की ट्रेन में
साथ रहेगी तो इस भीड़ में भी मज़ा आएगा. यह कह’ते हुए परेश ने सुरभि की
गान्ड की दरार में अंगुल चला दी. सुरभि चिहुन्क के रह गई पर बोली कुच्छ
नहीं. तभी परेश ने सुरभि के नाना को वापस आते देखा और बोला,

"देख सुरभि, तेरा नाना आ रहा है. सीट मिली होगी तो मैं तेरे साथ आउन्गा
नहीं तो तू मेरे साथ आजाना. नाना ने आके बताया कि कोई सीट नहीं मिली है
यह सुन परेश खुश हो गया. तभी परेश ने एक कुली से बात की तो कुली ने बताया
कि 500/- लगेंगे और दो जनों की बैठ’ने की वह व्यवस्था कर देगा. परेश ने
किसी तरह 400/- में सौदा पटाया और अप’ने पर्स से 400/- निकाल’के कुली को
दे दिए. सुरभि के नानाजी तुरंत अप’ने पॉकेट से 200/- निकाल’के परेश को
देने लगे तो परेश बोला,

अरे आप यह क्या कर रहे हैं. सुरभि तो मेरी बिटिय जैसी है. आप बिल्कुल
फ़िक़र नहीं करें. मुझे भी भूसावल जाना है और सुरभि बिटिया को आराम से
इसके घर पाहूंचा देंगे. सुरभे और उसके नानाने आँखों से क्रितग्यता प्रकट
की और तभी ट्रेन धीरे धीरे प्लॅटफॉर्म के अंदर आने लगी. तभी वह कुली आ
गया और उस’ने परेश और सुरभि का सामान उठ लिया और एक भीड़ भरे डब्बे में
चढ गया. वह डिब्बे के बाथरूम के साम’ने जाके रुका और दरवाजा ठक’ठकाया तो
उस’के भीतर बैठे एक साथी ने दरवाजा खोला. कुली ने दोनों का सामान वहाँ रख
दिया और वापस जाने के लिए जैसे ही मुड़ा परेश ने उसे पकड़ लिया और पूचछा,

अबे भोस’डी के सीट कहाँ है. कुली ने कहा,

"साहब यह सीट मतलब बुगी का टाय्लेट है. इतनी भीड़ मैं कोई भी पेशाब करने
नहीं आता. साहब आप यहीं बैठिये. भूसावल तो क्या 9-10 घंटे का ट्रिप है.
सुबह आप उतर जाओगे. बोलो, देदु यह जगह आप’को? वैसे अभी एक मिया-बीवी ने
दूसरा टाय्लेट लिया है 700 मैं. यह कह कुली तो चल’ता बना. परेश बूरी तरह
से बौख’लाया हुवा था और सुरभि से बोला,

"बेटी, अब तो लग’ता है यहीं रात गुज़ार’नी होगी. ऐसा करते हैं हम अंदर से
दरवाजा बंद कर लेते हैं और चाहे कोई भी कितना भी बजाए दरवाजा नहीं
खोलेंगे. यह कह परेश ने अंदर से दरवाजा बंद कर लिया. परेश के पास भी एक
सूटकेस था और सुरभि के पास भी एक सूटकेस. उस’ने दोनों सूटकेस बाथरूम की
दीवार से सटा के लगा दिए और सुरभि को उनपर बैठा दिया, खुद वेस्टर्न
स्टाइल की टाय्लेट की सीट पर ही बैठ गया. आदमी की ज़रूरत किसी भी
परिस्थिति में अप’ना रास्ता ढून्ढ लेती है. जैसे ही एकांत मिला, परेश का
दिमाग़ सुरभि के बारे में सोच’ने लगा. सुरभि उस’की बेटी की उमर की कच्ची
कली थी. वह सोच’ने लगा कि यह लड़’की इस भीड़ भरी ट्रेन में ज़रा भी विरोध
नहीं करेगी और भूसावल तक उसे मन’मानी कर’ने देगी. साथ ही उस’का बहशीपन भी
जाग’ने लगा.

सुरभि मुझे तो यह भीड़ देख के पेशाब लग गई. परेश कमोड के साम’ने खड़ा हो
गया और ज़िप खोली और अंडरवेर से 8′ लंबा लंड निकाल लिया और सुरभि के
साम’ने ही मूत’ने लगा. सुरभि आँखे फाड़ कर परेश अंकल का लंड देख रही थी.
ज़िंदगी मैं पह’ली बार वह लंड देख रही थी. परेश का वह तग’डा मोटा लंड
देखके सुरभि शरमाई पर फिर भी नज़र लंड से नहीं हट पायी. ऐसा नंगा लंड
देखके सुरभि का जिस्म अपने आप गरम होने लगा. उस’ने चुदाई की बातें सुनी
तो थी लेकिन कभी लंड नहीं देखा था. वा परेश के लंड से बह रही पेशाब की
धार देख रही थी. परेश अपना लंड मूठ मैं पकड़के मूत रहा था. सुरभि के
साम’ने अपना लंड बेशर्मी से मसल्ते परेश बोला,

"अरे बेटी, तू तो मुझे मूत’ते हुए बड़े ध्यान से देख रही थी. पह’ले कभी
किसी को मूत’ते हुए नहीं देखा है क्या? अब तो रात यहीं गुज़ार’नी है
इस’लिए सारे काम यहीं कर’ने पड़ेंगे. मुझे मूत’ते देख तुम्हें भी पेशाब
लगी हो तो कर’लो. परेश की बात सुनके सुरभि कुच्छ नहीं बोली, तब परेश
सुरभि को उठ कर खुद सूट्केसो पर बैठ गया और उस’से बोला,

"अरे, सलवार नीचे करके कमोड पे बैठ जा और च्चरर च्चरर कर’के मूत ले. मैं
जैसा तेरे साम’ने मूत रहा था तू भी मेरे साम’ने मूत. " सुरभि शरमाते हुए
कमीज़ उप्पर करके, सलवार और चड्डी नीचे करके कमोड पर बैठ गई. कुच्छ ही
देर में परेश के कानों में सुर सुर की आवाज़ पड़ी जिसे सुन वह और मस्त हो
गया. सुरभि का मूत’ना जैसे ही ख़तम हुवा परेश वेस्टर्न कमोड पे बैठ गया
और सुरभि का हाथ पकड़ के उसे अप’नी गोद में बैठा लिया.

"अब हमें कोई डिस्टर्ब नहीं करेगा, कोई दरवाज़ा बजाएगा तो मदेर्चोद की मा
चोद दूँगा. अब तू आरामसे अपने परेश चाचा की गोद में बैठी रह." परेश की
गंदी ज़ुबान सुन’के सुरभि कुच्छ उत्तेजित भी हो रही थी और उसे अब कुच्छ
कुच्छ इस अज़ान’बी चाचा से डर भी लग’ने लग गया था. फिर भी अप’ने को
नॉर्मल कर’ती हुई बोली,

"चाचा, यह क्या हम पूरे सफ़र टाय्लेट मैं बैठेन्गे क्या?" सुरभि की
चूचियों से खेलते हुए परेश बोला,

"और नहीं तो क्या? अरे इस भीड़ मैं यही एक जगह है जहाँ हमें कोई डिस्टर्ब
नहीं करेगा. तुम भी इस जर्नी को सारी जिंद’गी याद रखोगी. सुर’भी, तुम तो
पूरी जवान हो गई हो. कभी जवानी का मज़ा लिया या नहीं?

छ्ची! चाचा आप कैसी बातें कर रहे हैं. परेश ने अब सुरभि के एक मुम्मा
अप’ने हाथ में ले लिया था और बोला,

तुम्हारे मम्मे तो पूरी जवान लड़’की जैसे बड़े बड़े हैं. आज तो मज़ा
आजाएगा. देखो, आज रात भर मैं तुझे बहुत मज़ा दूँगा मेरी सुरभि जान और
तुझे सुबह तक लड़’की से औरत बना दूँगा समझी?"यार परेश के मुँह से यह सब
बातें सुनके सुरभि पूरी तरह शरमाई. वह अब समझ चुकी थी की परेश चाचा ने
जान बूझके यह जगह चुनी है जहाँ वह उसकी जवानी के साथ खेल सके. ऐसा नहीं
था कि सुरभि यह नहीं चाहती थी लेकिन एक अजनबी के साथ वा पह’ली बार अकेली
रहनेवाली थी रात भर और वह अजनबी उसके साथ क्या करना चाहता है यह उसे
मालूम था. सुरभि परेश से पह’ले ही कुच्छ डरी हुई थी पर इस भीऱ भरी ट्रेन
में वह परेश से दूर भी नहीं होना चाहती थी. सुरभि के चहेरे पे कुच्छ दर
देखके परेश उसके स्तन मसल्ते बोलता है,

"अरे तू क्यों डरती है जान? तू भूसावल तक मेरी अमानत है, बोल है ना?" अब
और शरम से सुरभि ने परेश को देखके हां मैं सिर हिलाया. इतने वक़्त से
परेश से अपना जिस्म मसल’वाके, टाय्लेट मैं एक मर्द की गोद में बैठ’के वह
जवान लौंडिया एक’दम गर्म हो गई थी. वह आज इस अजनबी चाचा के हाथो अपनी
जवानी लूटने तैयार थी.

ट्रेन ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी. टाय्लेट के बाहर बहुत शोर मचा था. सब
लोग भीड़ मैं अपने लिए जगह बना रहे थे. यहाँ परेश, सुरभि के जिस्म को
हौले-हौले मसल्ते उसे चूम’ने लगा. सुरभि भी आहे भरते उसका साथ दे रही थी.
जैसे ट्रेन ने स्पीड पकड़ी, परेश खड़ा हुआ और अपनी पॅंट शर्ट उतारी.
अंडरवेर से अपना मोटा लंबा लॉडा सह’लाते परेश बोला,
क्रमशः………..

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