Re: चुदक्कड़ घोड़ियाँ

[size=150:1k9avzml][color=#8000BF:1k9avzml] “ओ री सुधिया……….ज़रा दोनों हाथों से गांड फेला ले अब………उन्न्न्नन्न्न्नन्न्न्नन्न्न्नन्न्न्नन्न” नंदू लंड को हाथ में लेकर बोला.
“बिलकुल हीरा पे गया है कुत्ता ….. वो भी ऐसे ही कहता है “ओ री सुधिया”……….और मैं समझ जाती हूँ कि मैं चुदने वाली हूँ………ले घुसा” मम्मी ने एक हाथ से अपनी गांड खोलने की कोशिश की.
“काकी दोनों हाथों से फेलाओ अपने चूतड़……..तब मज़ा आएगा” नंदू मम्मी के नंगे चूतड़ पे थपकी मारकर बोला.
“दोनों हाथों से कैसे फेलाऊँ???…..मैं कुर्सी पे हूँ ……..अपनी छाती कहाँ टिकाऊँ?? अगर तू चाहता है कि मैं अपने दोनों हाथों से अपनी गदराई गांड फेला कर तेरे सामने परोसूं तो अपनी इस घोड़ी को उठा के बिस्तर पर ले चल ताकी मैं आगे झुक कर अपनी गर्दन बिस्तर पे टिका लूं. यहाँ कुर्सी पे तो बड़ी दिक्क़त होगी. और जब तू गांड मारेगा तो मुझे सहारा तो चाहिए ना!! यहाँ तो सहारे के लिए कुर्सी ही पकडनी पड़ेगी ……. और अगर कुर्सी पकडूगी तो गांड कैसे फेलाउंगी??” मम्मी जब दोनों हाथों से चूतड़ फेलाने की कोशिश करने लगीं तो घोड़ी बनी रहने की कोशिश में अपने दोनों घुटनों पे बैलेंस करने लगीं. इतने में ही नंदू ने उनकी खुली गांड में अपने मोटे लंड से ज़ोरदार शॉट मारा. मक्खन लगा लंड का सुपाड़ा दनदनाता हुआ मम्मी की गांड में दाख़िल हो गया. पर इससे मम्मी का बैलेंस बिगड़ा और संभलने के लिए मम्मी ने हाथों से अपने चूतड़ छोड़ झट से कुर्सी पकड़ ली. अगर मम्मी को पहले से हाथों का सहारा होता तो नंदू का लंड काफ़ी अंदर तक उनकी गांड में घुस जाता क्यूंकि नंदू गांड मारने के लिए बैचैन था और इसलिए इतना तगड़ा धक्का अपनी काकी की नंगी गांड में दे मारा था. पर फिर भी नंदू का सुपाड़ा मम्मी की गांड में जाकर फ़स गया था और मम्मी अपनी गांड से नंदू के लंड पे अटकी हुई थीं.
गांड लंड की मुंडी अपने मुंह में दबाये फूल पिचक रही थी और मम्मी पीछे मुड़ कर नंदू की तरफ़ देखती हुई अपने होंठ गोल करके “उन्न्ह्हह्ह …उन्न्न्हह्ह्ह” कर रहीं थीं. पर दृश्य बड़ा मादक था. मुझे पहली बार लगा कि काश मम्मी की जगह मैं उस कुर्सी पे होती और ठीक इसी तरह मेरी गांड में उस मोटे लंड की नथुनी फंसी होती. हालाँकि तब तक मेरी खुद की गांड कभी नहीं चुदी थी पर मम्मी के चेहरे को देख कर और उनकी मादक सिसकी सुन कर ऐसा लगा जैसे उनकी गांड में फंसी उस मोटे लंड की नोक उनकी गांड में मीठी गुदगुदी पैदा कर रही थी. अनायास ही मेरा हाथ सलवार के ऊपर से मेरी गुदा को कुरेदने लगा. ये पहली बार था जब मेरे दिल में अपने आप ही ये ख्याल आया कि काश मेरा चोदू हीरा काका भी इसी तरह अपने उस मोटे चूहे को मेरी गांड में घुसेड़ दे. उफ्फ्फ्फ़…..कितना गुदगुदाता होगा ना लंड गांड में घुस कर. मैं आज तीसरी बार हीरा काका से अपनी चूत चुदवा के आई थी. पर मुन्ना काका तो अभी अभी कह रहे थे कि हीरा काका गांड नहीं चोदते. मैं सोच में पड़ गयी कि जिस गांड को चोदने और चाटने के लिए ये तीनों सांड मरे जा रहे हैं हीरा काका तो उसे हाथ भी नहीं लगाते. आज ही उन्होंने खेत पर मुझे एक प्लास्टिक की उलटी बाल्टी पर बिलकुल नंगी करके घोड़ी बना कर पुरे घंटे भर चोदा था पर काका ने मेरी गांड और गुदा को छुआ तक नहीं जबकि लड़की को पीछे से घोड़ी बना के चोदने से उसकी गुदा हमेशा मर्द के सामने होती है. हीरा काका चाहते तो मेरी गुदा को कम से कम ऊँगली से तो छेड़ ही सकते थे. मैं देख ही रही थी कि कैसे मुन्ना काका अभी भी गीता दीदी को चोदते हुए उनकी भूरी लचीली गुदा पे मक्खन मल रहे थे. मुन्ना काका के चेहरे पर ऐसे भाव थे जैसे कोई नायाब चीज़ उनके हाथों में हो. और सच में लड़की की गांड का छेद बेहद नायाब होता है. अगर लड़की पूरी नंगी भी खड़ी हो जाये तो भी उसकी गुदा उनके चूतडों में दुपकी रहती है. लड़की को थोड़ा झुका कर और उसके चूतडों के पट खोल कर ही आप लड़की की मलाईदार गुदा को देख सकतें हैं. तो हीरा काका ने मेरी गुदा को हाथ क्यूँ नहीं लगाया?? और यहाँ हॉल में दो मदमस्त नंगी घोड़ियों को अपनी गांड चुद्वाते देख कर मेरा मन भी गांड मरवाने का करने लगा. पर मुझे हीरा काका से कोई उम्मीद नहीं लग रही थी. जब उन्होंने रम्भा, सज्जो और मम्मी जैसी इतनी गदराई और गरम औरतों की गांड नहीं मारी तो वो मेरी क्या मारेंगे. मुझे लग रहा था कि आने वाले वक़्त में नंदू, भोंदू या फिर मुन्ना काका में से कोई एक मेरी गांड चटकाएगा…..मेरी मटकी फोड़ेगा. मैं ये सोच के रोमांचित हो रही थी कि तभी एक तेज़ थप्पड़ की आवाज़ ने मुझे चौका दिया.
“चटाक”
ये थप्पड़ नंदू ने मम्मी की गांड पे जड़ा था. मम्मी की गांड एकदम से थिरक गयी पर नंदू के लंड की नथुनी अभी भी उनकी गांड में फंसी थी.
“सुधिया काका फेलाओ ना अपने चूतड़…….. “चटाक”…. “चटाक”…. “चटाक”…. “चटाक”….” नंदू मम्मी की गांड में लंड फंसाए लगभग गुर्राता हुआ बोला और उनकी गांड पे ज़ोर ज़ोर से चांटे जड़ने लगा.
“आःह्ह्ह………..हरामी….कह तो रही हूँ कि बिस्तर पर ले चल फिर आराम से कूद कूद के चोदना……..आस्सीईईईई….उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह …. उह्ह्हह्ह ….कमीने पहले लंड तो दाल दे गांड में फिर चाहे कितने थप्पड़ मार लेना. …..उन्ह्हह्ह्ह्हह्ह तू तो मुन्ना से भी बेरहमी से थप्पड़ लगाता है.”
मुझे अब ये नज़ारा बड़ा अच्छा लगने लगा था. भोंदू को तो मैंने रम्भा की गांड चोदते हुए तब देखा जब उसका लंड उसकी माँ की गांड में एडजस्ट होके सटा सट उस रंडी की गांड चोद रहा था. पर यहाँ में नंदू को मम्मी की गांड में लंड की एंट्री करवाते हुए देख रही थी. देखने से ही ऐसा लग रहा था कि भले ही गांड रोज़ चुदती हो पर हर रोज़ लंड को गांड में घुसेड़ने में थोड़ा टाइम लगता है और मेहनत भी. ये बात मुझे तब और ज्यादा समझ आई जब मेरी खुद की गांड रोज़ चुदने लगी थी. गांड रोज़ रात को सोने के बाद वापस नार्मल हो जाती और अगले दिन मेरी गांड चोदने वाले को अपना लंड मेरी गांड में दाखिल करने में टाइम लगता. मुझे तो सच्ची ……. पर्सनली शुरू के वो 15-20 मिनट…… जब मर्द अपने मोटे लंड को धीरे धीरे मेरी गांड में घुसेड़ते है ……… बड़े मस्त लगतें हैं. और तब तो काफ़ी मज़ा आता है जब लड़का लंड घुसेड़ने का प्रयास करता है पर बार बार नाकाम होता है. बार बार दिल में टीस उठती है कि इस बार लंड गांड में दाखिल हो जायेगा पर लंड गांड में घुसता ही नहीं. मैं बार बार अपनी नंगी गांड अपने चोदू को सोपती हूँ इस उम्मीद में कि वो इस बार जरूर मेरी फुदकती गांड में लंड दाल देगा और चोदना शुरू करेगा पर वो किसी ना किसी कारण से नाकाम हो जाता. कभी ज़ोर लगने से लंड गुदा से फिसल जाता है और गांड में नहीं घुसता और लड़के की झंड हो जाती है. कभी अगर लंड की मुंडी गांड में अटक भी जाती है तो अगले धक्के का कोण सही ना होने पर लंड उछल कर गांड से बाहर आ जाता है. ऐसे में तो बड़ा गुस्सा आता था क्यूंकि लंड की नथुनी गांड में दाखिल होकर झनझनाहट पैदा कर देती थी और गांड लंड खाने के लिए फड़क उठती थी पर लंड उछल कर किसी स्प्रिंग की तरह गांड से बाहर आ जाता था. पूरा मज़ा किरकिरा हो जाता था और लड़का फिर कोशिश में लग जाता था. चुदाई के भाषा में इसे “घोड़ी को नथ पहनाना” या “गांड का पनीर फाड़ना” भी कहा जाता है. “घोड़ी को नथ पहनाने” या “गांड का पनीर फाड़ना” का मतलब होता है कि लड़की या औरत की गांड में लंड को जड़ तक घुसेड़ने में कामयाब होना. दरसल गांड काफ़ी मामलों में चूत से अलग होती है. पर सबसे बड़ी खूबी गांड की ये होती है कि गांड चाहे जितना चुद ले पर दो या तीन दिनों के लिए भी अगर इसकी चुदाई ना हो तो गांड में कसावट वापस आ जाती है यानि “गांड का पनीर फिर जम जाता है”. इसे चुदाई की भाषा में “लड़की की नथ उतरना” कहतें हैं. और अगर गांड हफ्ते, दो हफ्ते ना चुदे तो बिलकुल कुंवारी जैसी हो जाती है बस फ़र्क इतना होता है कि चुदी चुदाई गांड को फिर से चुदवाने में औरत को पहली बार के मुकाबले 60 से 70 फीसदी तक कम दर्द होता है. बाकि मर्द पे निर्भर करता है कि वो औरत को कितना दर्द देना चाहते हैं. क्यूंकि मर्दों को गांड चोदने में तब बड़ा आनंद आता है जब औरत चुदते टाइम दर्द से बिलबिलाती है, चीखती है और दहाड़े मारती है. दर्द से रम्भाती घोड़ी को मर्द बड़े ही चाव से घंटों चोदते रहतें हैं और बड़े ही जोशीले ढंग से चोदते हैं. कई चुदक्कड़ औरतें तो मर्दों को और ज्यादा उकसाने के लिए ज़ोरों से दहाड़े मारती हैं ताकि मर्द किसी पागल कुत्ते की तरह उनकी गांड चोदे. इसलिए ही तो कहतें है कि औरत की गांड किसी ऐसी जगह पे चोदनी चाहिए जहाँ कोई ना हो दूर दूर तक. जैसे की पुराने खंडरों में, या किसी तहखाने में. क्यूंकि 3-4 दिनों में ही औरत की नथ उतर जाती है और ये नियम है कि जब जब कोई मर्द किसी “घोड़ी को नथ पहनाता” है तो औरत चीखती है, चिल्लाती है. मुझे तो जब भी कोई मर्द नथ पहनाता है तो मेरी किल्ली निकल जाती है. पर वो गांड मरवाना ही क्या जिसमे किल्ली न निकले. खेर ये सब ज्ञान तो मुझे तब मिला जब मैं भी खूब गांड मरवाने लगी. पर उस वक़्त जब मैं हॉल में खड़ी ये ग्रुप चुदाई देख रही थी मेरी गांड एकदम कुंवारी थी. गांड तो गांड मेरी तो चूत भी सिर्फ ३ बार चुदी थी. इसलिए मुझे इस चीज़ का तो बिलकुल अहसास नहीं था कि मम्मी या रम्भा या दीदी को अपनी गांड में लंड लेना कैसा लगता होगा पर नंदू का लंड मम्मी की गांड में घुसते ही जो आनंद उनके चेहरे पे दिख रहा था उसे देख के लग रहा था जैसे बहुत आनंद दे रहा था उन्हें नंदू का लंड. मैं बड़े चाव से उन्हें देख रही थी कि कैसे १७ साल का नंदू एक ४४ साल की अधेड़ औरत की गांड में अपना मोटा लंड फंसाए खड़ा था.
“चूतड़ फेलाओ ना काकी…..”नंदू की आवाज़ में गुर्राहट थी.
“अरे मुन्ना काका तुम मेरी कुर्सी मम्मी की कुर्सी से बिलकुल सटा दो. इस तरह मम्मी और मैं बिलकुल अगल बगल एक दुसरे से सट के घोड़ी बन जाएँगी.” दीदी ने पीछे घूम कर अपने नंगे चूतडों से खेलते मुन्ना काका से कहा. पता नहीं दीदी ने ऐसा क्यूँ कहा था.
“हाँ तब तो और मज़ा आएगा……क्या कहता है नंदू? पर तू ही अपनी घोड़ी की कुर्सी इधर सरका नंदू. मेरी घोड़ी तो लंगड़ी है. उसे उतरने चड़ने में दिक्क़त होती है.” काका दीदी के पैरों की परेशानी की वजह से दीदी को कुर्सी से उतारना नहीं चाहते थे.
“काका तुम भी ना………….बस……..अरे देख नहीं रहे हो नंदू ने मम्मी की गांड में लंड दाल रखा है. वो लोग अब शुरू कर चुके हैं. उन्हें मत हिलने के लिए बोलो. मैं उतरती हूँ कुर्सी से तुम मेरी कुर्सी सटा दो मम्मी की कुर्सी से.” कहते हुए दीदी जमीन पर हाथ रख कर कुर्सी से नीचे उतर गयीं.
मुम्म काका ने दीदी की कुर्सी जैसे ही मम्मी की कुर्सी से सटा के रखी मेरी लंगड़ी दीदी बड़ी फुर्ती से फिर से कुर्सी पर चड़ गयीं और चौपाया होकर घोड़ी बन गयीं. अब दीदी की नंगी गांड मम्मी की नंगी गांड से साइड से टच हो रही थी. तभी नंदू ने शरारत की और अपनी बायीं हाथ की पहली ऊँगली अपने थूक में भिगो कर दीदी की गांड में घुसेड़ दी. दीदी की गांड में पहले से ही मक्खन लगा था. ऊँगली फुचुंक से दीदी की गांड में घुस गयी.
“उन्नंहह्न्न्नन्न ………..” दीदी सीसक पड़ी.
“ओह्ह्ह…….मुन्ना चाचा……तुमने तो मस्त चिकनी कर रखी है दीदी की मतवाली गांड……….उन्ह्ह्हह कितनी गरम हो रही है अंदर से जैसे गांड में गरम गरम मूंग दाल का हलवा भरा हो………..पर छल्ला बड़ा टाइट है चाचा इस चुदैल की गांड का. देखो कैसे गांड चुदाने के लिए उछल कर घोड़ी बन गयी ये लंगड़ी कुतिया.” नंदू ऊँगली दाल कर दीदी की गांड में चारों तरफ घुमा रहा था.
“चल नंदू अब इन दोनों माँ बेटियों को नथ पह्नातें हैं, फाड़ते हैं इनका दो दिन पुराना पनीर ………..दाल देते हैं इन दोनों की मतवाली गांडो में अपने अपने लंड………उह्ह्हन्न्न्नन्न ……..आज तो गांड फाड़ डालूँगा इस लंगड़ी घोड़ी की. खूब कूद कूद के चोदुंगा इस सूअर की बच्ची को. साली लंगड़ी रांड.” मुन्ना दीदी की गांड को बुरी तरह मसलता हुआ बडबडाने लगा.[/color:1k9avzml][/size:1k9avzml]

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