Re: खेल खिलाड़ी का

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[size=150:8iag24ug][color=#8000BF:8iag24ug]खेल खिलाड़ी का पार्ट–34

गतान्क से आगे…………

"प्रोफेसर..",सवेरे के सूरज की रोशनी अब महाराजा सुजान सिंग के महल के उस खास कमरे को रोशन कर रही थी.प्रोफेसर पीठ के बल लेटा था & दिव्या उसके पेट पे सर रखे लेटे थी.बाहे पीछे की ओर मोड़ उसने दाया हाथ प्रोफेसर के चेहरे को सहलाने मे लगाया हुआ था & बाया उसके पेट के नीचे लंड के ठीक उपर के हिस्से को,"..तुमने प्लान किया था ना यहा लाके मुझे चोदने का?",उसने हल्के से अपना सर दाई तरफ घुमाया.

"मैने प्लान किया था तुम्हे ये कमरा दिखाने का..",प्रोफेसर अपने हाथो मे उसका मुलायम हाथ ले हौले-2 उसे चूम रहा था,"..इस कमरे की कहानी सुनाने का..क्यूकी तुम इसकी हक़दार थी.तुम मेरी चाह समझ उसे मानोगी इसकी ख्वाहिश थी मुझे लेकिन उमीद नही."

"क्यू?"

"तुम्हारे जैसी हुसनपरी मेरे जैसे इंसान पे अपनी नज़रे करम की इनायत करेगी इसका यकीन नही था मुझे.",प्रोफेसर की बात पे दिव्या मुस्कुराइ & अपना हाथ उसके हाथो से छुड़ाया & करवट ले अपने पेट के बल हो गयी & अपनी टाँगे घुटनो से मोड़ हवा मे उठा दिलकश अंदाज मे हिलाने लगी & प्रोफेसर को देखते हुए वही पे चूमने लगी जहा थोड़ी देर पहले उसका बाया हाथ था.प्रोफेसर ने हाथ अपने सर के अगल बगल फैला लिए & आहे भरने लगा.उसने नीचे देखा तो दिव्या का चेहरा उसके बालो से च्छूप गया था.दाए हाथ से उसने वो आब्नुसि चिल्म हटाई & उस मस्ती मे डूबे चेहरे का दीदार किया जो अब उसके तने लंड को अपने होंठो की शबनम से भिगो रहा था.

दिव्या का दाया हाथ प्रोफेसर की मोटे तने जैसी मज़बूत जाँघो के बालो मे घूम रहा था & बाया लंड की जड को पहली उंगली & अंगूठे के दायरे मे कसे हुए था.हाथ की बाकी उंगलिया प्रोफेसर के बड़े,बिना बालो के आंडो पे जमी हुई थी,"क्या यहा हम हमेशा नही रह सकते?",अपनी बचकानी बात पे 1 बार फिर लंड को मुँह मे लेने से पहले दिव्या खुद ही ह्नस दी.

"काश ऐसा होता,दिव्या.",प्रोफेसर ने प्यार से उसके बालो को उसके चेहरे से हटाया & फिर गाल को सहलाया,"..तुम्हारी बाहो मे तुम्हे प्यार करते हुए मरना तो जीने से कही बेहतर होगा."

"उउंम…अपनी किताबी बाते यहा मत करो..!".दिव्या ने आंडो को दबाते हुए लंड के छेद को जीभ की नोक से छेड़ प्रोफेसर को पागल कर दिया.उसने प्रोफेसर को प्यार भरी झिड़की तो दी थी मगर उसकी बात से उसके दिल मे खुशी की लहर फुट पड़ी थी,बताओ ना!कब तक हैं हम यहा?"

"बस दोपेहर तक.शाम को क्लब वियेन्ना नही जाना?",दिव्या उसके लंड को छ्चोड़ प्रोफेसर के पेट को चूमती हुई उसके सीने तक आ पहुँची थी.उसने अपने गदराए मगर सुडोल बदन को प्रोफेसर के जिस्म की लंबाई पे जमा दिया.उसके मुलायम जिस्म के एहसास ने प्रोफेसर को पागल कर दिया & उसके हाथ दिव्या की पीठ से लेके उसकी गंद तक घूमने लगा.प्रोफेसर के हाथ बेचैन हो गये थे,उन्हे समझ नही आ रहा था कि दिव्या के नशीले बदन के किस हिस्से को सहलाए & किसे दबाएँ!

"उउम्म्म्म….!",दिव्या का भी यही हाल था.वो प्रोफेसर के होंठो को चूम रही थी,उसकी जीभ से खेल रही थी लेकिन उसका मन भर ही नही रहा था..उसका दिल कर रहा था कि उम्र भर अपनी ज़ुबान को उसकी आतुर ज़ुबान से यू ही मिलाती रहे,"..जाना है पर जब तक यहा हैं तब तक मैं बस इसके..",प्रोफेसर के उपर से उतर वो अपनी दाई करवट पे हुई & अपना बाया हाथ प्रोफेसर के चेहरे पे फिरा उसकी ओर इशारा किया,"..& इसके..",उसने अपनी बाई टांग प्रोफेसर की दाई टांग के उपर चढ़ा दी & अपना बाया हाथ उसके चेहरे से नीचे ले जा उसके लंबे लंड को दबा दिया,"..बारे मे सोचना चाहती हू."

बिना 1 पल गवाएँ प्रोफेसर ने दाए हाथ से उसकी गंद की बाई फाँक को थामा & नीचे से अपना आधा लंड उसकी चूत मे घुसा दिया.

"औउईईई….!",दिव्या दर्द से कराही & अपना सर पीछे झटका.प्रोफेसर ने अगले धक्के मे लंड को पूरा उसकी चूत मे घुसा दिया & सर झुका के उसके गुलाबी निपल्स को चूस्ते हुए उसे चोदने लगा.

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ग्लोरीया अपार्टमेंट्स-4 आलीशान टवर सुंदर गेट & ऊँची दीवारो के पीछे खड़े थे.सभी टवर्स 14 मंज़िल के थे.पहले 4 टवर्स मे 2 कमरो से लेके 3 कमरो तक के फ्लॅट्स थे.पाँचवे टवर मे 6 कमरो के पेंटहाउसस बने हुए थे & इसी के सातवी मंज़िल के पेंटहाउस के बारे मे जानने अजीत वाहा आया था.

"सलाम साब.",मेन गेट पे बने कॅबिन मे 2 गार्ड्स मे से 1 ने उसकी वर्दी देख उसे सलाम किया.

"हूँ..कब से यहा काम कर रहे हो?"

"2 साल से उपर हो गया,साहब.",अजीत कॅबिन के अंदर घुस गया & वाहा रखी चीज़े देखने लगा.

"इधर यहा औरत के बॅग & चैन छीनने के केसस के बारे मे सुना है."

"हां,साहब.बाइक पे लड़के कर रहे हैं ये सब."

"किसी की शक्ल देखी है?"

"कहाँ साहब!हेल्मेट लगाए रहते हैं."

"अच्छा!अपार्टमेंट ब्लॉक के अंदर तो कोई तकलीफ़ नही होती ना?"

"नही साहब."

"क्या करें भाई!उपर से ऑर्डर आया है कि ज़रा यहा का राउंड लगाऊं.काफ़ी बड़े लोग रहते हैं ना यहा!"

"वो तो है साहब.हमारी भी हालत खराब रहती है."

"यही रिजिस्टर है जिसमे आने-जाने वालो का रेकॉर्ड रखते हो?",अजीत गार्ड की कुर्सी पे बैठ गया & रिजिस्टर उठा लिया.

"जी साहब..",दूसरा गार्ड बोला,"..बाहर से आनेवाले का नाम,पता,उसकी गाड़ी का नंबर,फोन नंबर,आने का टाइम,जाने का टाइम & जिस फ्लॅट मे आया है वाहा का नंबर लिखते हैं."अजीत रिजिस्टर के पन्ने पलट रहा था.सतपाल ने उसे बताया था कि CM मधुकर अत्रे अक्सर पेंटहाउस ब्लॉकके की सातवी मंज़िल के फ्लॅट नंबर 700 मे आया करता था.फ्लॅट के अंदर केवल वो जाया करता था & कोई नही.सतपाल & बाकी बॉडीगार्ड्स बाहर ही खड़े रहते थे.वैसे भी उस मंज़िल पे 1 ही फ्लॅट था.जब भी CM यहा आता था तो वो अपनी प्राइवेट कार मे आता था जिसपे कोई भी सरकारी निशान नही होता था,उसके साथ की पाइलट & सेक्यूरिटी कार्स थोड़ा पहले ही रुक जाती थी & अपार्टमेंट के अंदर बस उसी की कार जाती थी.अभी 7 दिन पहले भी वो यहा आया था शाम को 8 बजे के करीब.

अजीत ने पन्ने पलटते हुए उस दिन का रेकॉर्ड खोला & शाम के 8 बजे की एंट्री पे निगाह डाली-‘ए.कुमार,फ्लेट नंबर.123,वसुधा अपार्टमेंट,संदेश कॉलोनी,डेवाले’,फिर 1 फोन नंबर & फ्लॅट के मालिक का नाम ‘आर.एस.अवस्थी’.कॅबिन की दीवार पे होर टवर मे रहने वालो के नाम & उनके इंटरकम नंबर्स की लिस्ट लगी थी.गार्ड अपने इंटरकम से फ्लॅट वालो को उनके यहा आने वाले मेहमान की खबर दे देता था.उस लिस्ट पे नज़र डाली & वाहा भी वही नाम था.अजीत को 1 बार फिर पसीने छूट गये.उसने रिजिस्टर बंद किया & वाहा से निकल आया.

अवस्थी कॅबिनेट सेक्रेटरी था यानी राज्य का सबसे ऊँचा सिविल सर्वेंट या सरकारी अफ़सर & CM का खास आदमी….आख़िर माजरा क्या था?..वो टेंटवाला,CM,अवस्थी ये सब क्या खेल खेल रहे थे?..इतने बड़े लोगो का इस मामले से जुड़ा होना..ये सब ठीक नही था..उसे डीसीपी साहब को बता देना चाहिए अब..लेकिन उस से क्या होगा..सब सावधान हो जाएँगे & वो आर्म्स डीलर भी..CM,अवस्थी जैसे लोगो को तो वो हाथ लगा ही नही सकता लेकिन वो हथ्यारो का कारोबारी तो उसकी गिरफ़्त मे आ ही सकता है..1 बार सबूतो के साथ पकड़ा गया तो इन बड़े लोगो को उस से पल्ला झाड़ते देर नही लगेगी & उसका मक़सद पूरा हो जाएगा..अभी बात खुद तक रखनी ही ठीक है..अजीत ने जीप स्टार्ट की & दफ़्तर के लिए चल पड़ा.

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8 बजते ही दिव्या प्रोफेसर के साथ क्लब वियेन्ना पहुँच गयी थी.अपने करियर मे पहली बार दिव्या को काम करने का दिल नही कर रहा था.महल मे सवेरे की चुदाई के बाद दोपहर को वाहा से निकलने के वक़्त तक दोनो नंगे 1 दूसरे की बाहो मे पड़े रहे थे.खाना भी उन्होने उसी हालत मे खाया.महल से फ्लॅट तक के कार के सफ़र मे दिव्या प्रोफेसर से सटके बैठी थी & 1 पल के लिए भी अलग नही हुई.फ्लॅट पे पहुँचते ही दोनो ने 1 बार फिर चुदाई की थी & मिनिट्स मे तैय्यार होने वाली दिव्या को आज आधा घंटा लगा था क्यूकी तैय्यार होने से ज़्यादा उसका दिल अपने महबूब की किस्सस & हाथो की हर्कतो मे लग रहा था.

"यही है डीजे छाज़े..",1 बआउन्सर ने दोनो को 1 लंबे बालो वाले शख्स के सामने ला खड़ा किया.उस शख्स ने गोटी रखी हुई थी & कानो & दाई भौं के अलावा उसका निचला होंठ भी पियरस्ड था वाहा रिंग लगा था.दिव्या ने उसे अपना & प्रोफेसर का परिचय दिया & शोभा की तस्वीर दिखाई.तस्वीर देखते ही छाज़े के चेहरे पे गम के बदल च्छा गये.

"क्या आप मेरे शो के बाद मिल सकते हैं?",उसकी आवाज़ की गंभीरता सुन प्रोफेसर & दिव्या के पास और कोई चारा नही था,"..आप होटेल के इंडियन रेस्टोरेंट मे बैठिए,मैं वही मिलता हू आपसे 1 घंटे बाद."

"ओके."

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"तुम्हारा असली नाम क्या है?",दिव्या ने पुचछा.

"चंपक भुल्लर.",छाज़े उनके साथ बैठा था.दिव्या को नाम सुन हँसी आई जिसे उसने ज़ब्त कर लिया.

"इस लड़की को कैसे जानते थे?"

"दीप्ति..मेरा पहला प्यार थी.",छाज़े अपने ड्रिंक के ग्लास को बस घुमा रहा था,पी नही रहा था.

"कहा मुलाकात हुई थी तुम्हारी?"

"2 साल पहले 1 कॉलेज फेस्ट मे मैं डीजे कॉन्सोल हॅंडल कर रहा था,वही मिली थी.उसी वक़्त मुझे क्लब नीयान मे डीजे का काम मिला था.हम हर शाम वाहा मिलते थे,मेरे शो के बाद हम साथ डिन्नर करते &.."

"और?",प्रोफेसर ने सवाल किया.

"..& वही करते जो प्यार मे पागल 2 जवान लोग करते हैं."

"1 बात बताओ..",दिव्या ने अपनी कोहनिया मेज़ पे टिकाई,"..उसके परिवार वालो को ऐतराज़ नही था तुम दोनो के रिश्ते पे?"

"वो अपनी मा के साथ यहा रहती थी & कहती थी कि मैं उस बात की परवाह ना करू,उसकी मा कभी हमारे बीच नही आएगी."

"फिर क्या हुआ?जुदा कैसे हुए तुम दोनो?",छाज़े कयि पॅलो तक खामोश बस अपने ड्रिंक को देखता रहा.

"आप पोलिसेवाले हैं तो उसके बारे मे क्यू पुच्छ रहे हैं?"

"1 केस के सिलसिले मे."

"उसका क्या लेना-देना है इस से?"

"देखो,चंपक..",दिव्या की आवाज़ मे पुलिसिया लहज़ा आ गया,"..तुम्हारी एक्स-गर्लफ्रेंड 1 ख़तरनाक लड़की है & अगर तुम ये सोच रहे हो कि हमसे झूठ बोलके उसे बचा अपना प्यार साबित करोगे & वो तुम्हारी बाहो मे दौड़ी चली आएगी तो तुमसे बड़ा बेवकूफ़ इस दुनिया मे कोई नही!",बेबाकी से कहे गये सच ने छाज़े को चौंका दिया.

"अब मुँह बंद करो,ये देवदास वाला अंदाज़ छ्चोड़ो & सब तफ़सील से बताओ.",प्रोफेसर दिव्या के अंदाज़ पे मन ही मन मुस्कुराया.

"जी..",छाज़े ने थूक गटका,"..1 साल तक सब ठीक चलता रहा.हम जब मर्ज़ी,जैसे मर्ज़ी मिलते रहते.हम बहुत खुश थे लेकिन फिर दीप्ति की मुलाकात 1 दिन क्लब मे क्लब के मॅनेजर से हुई.इसके 1 महीने के बाद से वो मुझ से कटी-2 रहने लगी.मेरी समझ मे कुच्छ नही आ रहा था कि आख़िर बात क्या है फिर 1 रात शो के बाद मैं अपना 1 बॅग क्लब मे भूल गया.उसमे कुच्छ ज़रूरी काग़ज़ात थे जिनकी मुझे अगली सुबह ज़रूरत थी.मैं सवेरे-2 क्लब पहुँचा,अपना बॅग उठाया & निकल ही रहा था कि कुच्छ आवाज़ो से चौंक पड़ा जोकि मॅनेजर दिनेश सिंग के कॅबिन से आ रही थी.मैं सोच मे पड़ गया क्यूकी 12 बजे से पहले कभी वो क्लब आता नही था.."

"..नज़दीक गया तो मुझे एहसास हुआ कि वो किसी लड़की के साथ है.मैने सोचा की चलो देखते हैं कि किसके साथ अयाशि कर रहा है,दोस्तो के साथ हँसी-मज़ाक का अच्छा मसाला मिलेगा लेकिन जब मैने दरवाज़े को हल्के से खोल अंदर झाँका तो मेरा खून सुख गया,मेरी जान..मेरी दीप्ति बिल्कुल नंगी मॅनेजर के उपर उसके लंड को अपने अंदर लिए हँसती हुई उच्छल रही थी.",छाज़े की आँखो मे पानी आ गया मगर उस पानी के पीछे गुस्सा सॉफ दिख रहा था.

"फिर?"

"फिर क्या!मैने वो क्लब छ्चोड़ दिया & तब से यहा हू,मैने दीप्ति से भी मिलने की कोई कोशिश नही की.उसके बाद वो भी यहा से गायब हो गयी थी."

"तुम ज़रा दीप्ति का पता,नंबर,कॉलेज का नाम & जो भी कुच्छ जानते हो इस काग़ज़ पे लिख दो.",दिव्या ने काग़ज़ & कलम उसकी ओर बढ़ाया & प्रोफेसर की ओर देखा.दोनो जानते थे कि अब अगली मुलाकात दिनेश सिंग से करनी है.

1 बार फिर दिव्या & प्रोफेसर दीक्षित क्लब नीयान मे थे.इस वक़्त क्लब बिल्कुल भरा हुआ था & वाहा के स्टाफ को सांस लेने की भी फ़ुर्सत नही थी.स्टाफ के 1 मेंबर ने बाते की कुच्छ खास मेहमआनो की वजह से दिनेश सिंग बहुत मसरूफ़ है तो अगर वो बुरा ना माने तो रात 12 बजे उस से मिल ले या फिर अगले दिन का इंतेज़ार करें.दोनो ने तय किया कि दोनो 12 बजे का इंतेज़ार करेंगे.

समय काटने के लिए दोनो पहले 1 रेस्टोरेंट मे गये & खाना खाया & फिर प्रोफेसर की कार मे वही आस-पास चक्कर लगाने लगे.प्रोफेसर ने 1 सुनसान गली मे कार रोकी तो दिव्या खुद अपनी सीट से उठ उसकी गोद मे आ गयी.उसकी दाई बाँह प्रोफेसर की गर्दन मे झूल गयी & बाया हाथ उसकी पॅंट पे चलने लगा.प्रोफेसर ने भी उसे आगोश मे भरते हुए बाया हाथ उसकी गंद को दबाने मे लगाया & दाए से उसकी मस्त चूचियों को उसके टॉप के उपर से ही दबाने लगा.

चंद पॅलो मे ही दिव्या उसके हाथो की कारस्तानियो की वजह से झाड़ गयी.झाड़ते ही वो प्रोफेसर की गोद मे उसे अपने सीने से लगाके ज़ोर-2 से साँसे लेने लगी.किसी मर्द के लिए ऐसी दीवानगी.ऐसा जुनून उसने पहली बार महसूस किया था.ये सॉफ था कि दोनो 1 दूसरे के जिस्मो के पीछे पागल हैं लेकिन उनके इस रिश्ते मे केवल वासना नही थी.दोनो की चुदाई मे जिस्मो की 1 अंतहीन प्यास थी लेकिन उस प्यास के नशे मे ऐसा नही होता था कि दोनो को 1 दूसरे की तकलीफ़ का ख़याल ना हो.दोनो ने इस बात को अभी पूरी तरह से महसूस नही किया था मगर दोनो के दिलो के किसी कोने ने ये फिर जिसे अँग्रेज़ी मे सबकॉन्षियस कहते हैं,उसने इस बात को अच्छी तरह समझ लिया था.इस चलते जो लगाव पैदा हुआ था वही उनके रिश्ते को मज़बूती दे रहा था.

"ऊन्णन्न्….क्या कर रहे हो?..जींस उतार दो ना!",प्रोफेसर ने दिव्या की सीट को पूरा नीचे कर दिया था दिव्या को उसके उपर लिटा दिया था.दिव्या का टॉप उसके सीने के उपर चढ़ा हुआ था & ब्रा उसकी मोटी चूचियों के नीचे.गुलाबी निपल्स प्रोफेसर की ज़बान के रस से गीले चमक रहे थे & बिल्कुल सख़्त हो चुके थे.उनके आस-पास चूचियों पे हल्के & गहरे निशान प्रोफेसर के होंठो की करामात की गवाही दे रहे थे.

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क्रमशः……..

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