ठाकुर की हवेली compleet

[color=#0000FF:z9chre2v][size=150:z9chre2v]ठाकुर की हवेली

हेलो दोस्तो मैं यानी आपका दोस्त राज शर्मा एक ओर नई कहानी लेकर आपके सामने हाजिर हूँ तो कहानी का मज़ा लीजिए

धाम धाम ढोल बाज रहे थे जिन्हे 7-8 लोग बजा रहे थे और उनके पीछे दो तगड़े ग्रामीण एक मरे हुए बाघ को एक मोटी लकड़ी से बँधे ढोते चले आ रहे थे. उनके पीछे एक बहोत ही रॉबिला व्यक्ति घोड़े पर सवार था. उसके कंधे से बंदूक झूल रही थी जैसे उसीने उस बाघ को मारा हो.

18 वर्ष का रणबीर उस रोबीले व्यक्ति के पीछे चल रहा था. ठाकुर जब भी शिकार के लिए निकलता था उसे कुछ आदमियों की ज़रूरत पड़ती थी जिनका बंदोबस्त ठाकुर के मुलाज़िम ही गाँव के बेकार बैठे नवयुवकों को पकड़ कर दिया करते थे. ऐसा ही एक युवक रणबीर था.

"देखो… मालिक ठाकुर सॉह्ब ने आज एक शेर को मार गिराया." एक साधारण सा दीखने वाले किसान ने दूसरे किसान से कहा."

ये कारवाँ ठीक गाँव के चौपाल मे आकर रुक गया और वृढ ठाकुर अपने घोड़े से नीचे उत्तर आया.

"गाओं वासियों आज हम बहोत खुश है की इस नौजवान की वजह से हुमने ये शेर मार गिराया." वृढ ठाकुर ने रणबीर की तरफ देखते हुए अपनी रॉबिली आवाज़ मे कहा.

"कौन है इस इस नौव्जवान के मा-बाप" ठाकुर की रोबिली आवाज़ एक बार फिर चौपाल मे गूँज उठी.

तभी एक ग़रीब आदमी भीढ़ से निकल कर ठाकुर के सामने आकर खड़ा हो गया.

"बाबा….." उस आदमी को देख रणबीर के मुँह से अपने आप निकल पड़ा.

"ये मेरे बाबा है मालिक." रणबीर ने ठाकुर की और मुड़ते हुए कहा.

"तुम्हारा लड़का तो बहोत बहादुर है… अकेले ही इस शेर से भीड़ गया और इसने हमारी जान बचा ली. रणबीर की ज़रूरत हवेली मे है. हमे रणबीर की ज़रूरत है और आज हम तुमसे तुम्हारा बेटा अपने साथ ले जाने आए है….. क्या तुम हमे अपना बेटा दोगे?" ठाकुर ने कहा.

"आप ही का बच्चा है हज़ूर, अगर हवेली मे रहेगा तो कुछ सीखेगा नही तो यहाँ आवारा लड़कों के साथ रहेगा तो बिगड़ जाएगा."

"तो ठीक है… आज से रणबीर हवेली मे काम करेगा हमारे साथ." कहकर ठाकुर ने रणबीर के कंधों पर हाथ रखा और साथ चलने का इशारा किया.

"बाबा… हम जाएँ?" रणबीर ने अपने बाप के लगभग पैरों मे गिरते हुए पूछा.

"जा बेटा… ठाकुर साहेब की खूब सेवा करना और खूब मन लगाकर काम करना और जब भी बाबा की याद आए तो मेरे पास आ जाना, पास ही तो है हमारा गाओं. " उस वृढ ने रणबीर को सीने से से लगा लिया और उसके माथे को चूम कर उसे विदा किया.

ठाकुर का कारवाँ गाँव के चौपाल से चल कर एक विशाल हवेली के सामने जाकर रुक गया. रणबीर उस हवेली को निहारे जा रहा था. ठाकुर घोरे से नीचे उतरा और रणबीर को हवेली के अंदर ले गया. हवेली भीतर से बहोत ही शानदार थी और ऐशो आराम के तमाम खूबसूरतियों से साजी हुई थी.

"आओ हमे तुमसे कुछ कहना है," ये कहते हुए ठाकुर ने अपनी दराज़ से एक बहोत ही सुन्दर खंजर निकाला.

"ये लो तुम्हारी बहादुरी का इनाम."

रणबीर कुछ हिचकिचाया तो ठाकुर ने बड़े स्नेह से कहा, "रख लो…. ये तुम्हारी बहादुरी की पहचान है. बहुत सुंदर है ना…?"

"हां ठाकुर सॉह्ब…. बहोत सुंदर है." रणबीर ऐसा तोहफा पाकर बहोत खुश था.

"तो ठीक है आज से तुम हमारे ख़ास आदमी हुए… हमारी रक्षा करना और जो हमसे गद्दारी करे या फिर हमारा सामना करने की जुर्रत करे ये खंजर उसके सीने मे उतार देना."

"जी ठाकुर सहाएब." रणबीर ने झुकते हुए कहा.

ठाकुर बहोत खुश था की उसे एक ईमानदार और बहादुर नौवकर मिल गया है जो जीवन भर उसकी चाकरी करेगा.

"भानु… इधर आओ." ठाकुर ने पास ही खड़े एक मुलाज़िम को आवाज़ डी.

"जी मालिक." भानु ठाकुर के सामने आया और लगभग ठाकुर के कदमों को देखता दोहरा हो गया.

"आज से ये तुम लोगों के साथ पीछे वाले मकान मे रहेगा…. इसका ख़याल रखना… समझे? यह थक गया होगा, इसके खाने पीने का और आराम का बंदोबस्त करदो." ठाकुर ने कहा.

"जी मालिक." ये कहते हुए भानु रणबीर को अपने साथ ले हवेली से निकल पड़ा.

भानु रणबीर को लेकर अपने घर पहुँचा. यहाँ भानु अपने विधुर पिता रामानंद, अपनी चाची मालती को करीब 35 साल के थी और अपनी 17 साल की जवान बीवी सूमी के साथ रह रहा था.

भानु और सूमी दोनो ही अभी किशोरे अवस्था मे थे पर गाओं मे शादियाँ जल्दी हो जाती थी. भानु ने रणबीर का परिचय अपने घर के सदस्यों से करवाया. बातों बातों मे रणबीर को पता चला की मालती ने अपने पति को छोड़ दिया है और उसके बाद वो अपने जेठ के घर मे ही रह रही है.[/size:z9chre2v][/color:z9chre2v]

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