आंटी के साथ मस्तियाँ compleet

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आंटी के साथ मस्तियाँ-1

मैं आप लोगों के लिए अपनी ज़िंदगी का और खूबसूरत लम्हा एक कहानी के माध्यम से साझा कर रहा हूँ। बात उस समय की है जब मैं ग्रेजुयेशन कर रहा था। मेरे घर के पास एक फैमिली रहती थी।

पति और पत्नी, जो रिश्ते में मेरे अंकल और आंटी लगते हैं।

चूंकि.. आंटी भी कॉमर्स ग्रेजुयेट थीं, तो वो मुझे मेरी पढ़ाई में मदद करती रहती थीं। इसीलिए मेरा भी ज़्यादातर वक्त उनके घर पर ही व्यतीत होता था। मैं उन्हीं के यहाँ खाना ख़ाता और सो भी जाता था। कोई इसको बुरा या ग़लत भी नहीं कहता, क्योंकि वो मेरे अंकल और आंटी थे। यहाँ तक की उनके घर में भी मेरा एक कमरा हो गया था जिसे सिर्फ़ मैं पढ़ने और सोने के लिए इस्तेमाल करता था।

आंटी का नाम डॉली है। वो बहुत ही खूबसूरत और कमनीय काया की महिला हैं। उस वक़्त उनकी उम्र 22 साल और मेरी 19 साल थी। उनकी देहयष्टि का नाप उस समय 34-26-40 थी। पहले उनके लिए मेरे दिल में कुछ भी नहीं था, लेकिन एक घटना ने मेरा नज़रिया बदल दिया। मैं जब भी उनकी उभरी हुई ठोस चूचियाँ और गोल-गोल उभरे हुए चूतड़ों को देखता तो मेरे अन्दर बेचैनी सी होने लगती थी।

क्या मादक जिस्म था उनका। बिल्कुल किसी परी की तरह।

एक दिन की बात है, आंटी मुझे पढ़ा रही थीं और अंकल अपने कमरे में लेटे हुए थे। रात के दस बजे थे, इतने में अंकल की आवाज़ आई- सुम्मी और कितनी देर है जल्दी आओ ना..।

आंटी आधे में से उठते हुए बोलीं- राज बाकी कल करेंगे, तुम्हारे अंकल आज कुछ ज्यादा ही उतावले हो रहे हैं।

यह कह कर वो जल्दी से अपने कमरे में चली गईं।

मुझे आंटी की बात कुछ ठीक से समझ नहीं आई, काफ़ी देर तक सोचता रहा, फिर अचानक ही दिमाग़ की ‘ट्यूब-लाइट’ जली और मेरी समझ में आ गया कि अंकल किस बात के लिए उतावले हो रहे थे।

मेरे दिल की धड़कन तेज़ हो गई। आज तक मेरे दिल में आंटी को ले कर बुरे विचार नहीं आए थे, लेकिन आंटी के मुँह से उतावले होने वाली बात सुन कर कुछ अजीब सा लग रहा था।

मुझे लगा कि आंटी के मुँह से अनायास ही यह निकल गया होगा। जैसे ही आंटी के कमरे की लाइट बन्द हुई, मेरे दिल की धड़कन और तेज़ हो गई।

मैंने जल्दी से अपने कमरे की लाइट भी बन्द कर दी और चुपके से आंटी के कमरे के दरवाज़े से कान लगा कर खड़ा हो गया।

अन्दर से फुसफुसाने की आवाज़ आ रही थी पर कुछ-कुछ ही साफ़ सुनाई दे रहा था।

‘क्यों जी.. आज इतने उतावले क्यों हो रहे हो?’

‘मेरी जान, कितने दिन से तुमने दी नहीं… इतना ज़ुल्म तो ना किया करो मेरी रानी…!’

‘चलिए भी, मैंने कब रोका है, आप ही को फ़ुर्सत नहीं मिलती। राज का कल इम्तिहान है, उसे पढ़ाना ज़रूरी था।’

‘अब श्रीमती जी की इज़ाज़त हो तो आपकी बुर का उद्घाटन करूँ?’

‘हाय राम.. कैसी बातें बोलते हो, शरम नहीं आती?’

‘शर्म की क्या बात है, अब तो शादी को दो साल हो चुके हैं, फिर अपनी ही बीवी की बुर को चोदने में शर्म कैसी?’

‘बड़े खराब हो… आह..अई..आह हाय राम… धीरे करो राजा.. अभी तो सारी रात बाकी है।’

मैं दरवाज़े पर और ना खड़ा रह सका। पसीने से मेरे कपड़े भीग चुके थे, मेरा लंड अंडरवियर फाड़ कर बाहर आने को तैयार था। मैं जल्दी से अपने बिस्तर पर लेट गया, पर सारी रात आंटी के बारे में ही सोचता रहा। मैं एक पल भी ना सो सका, ज़िंदगी में पहली बार आंटी के बारे में सोच कर मेरा लंड खड़ा हुआ था।

सुबह अंकल ऑफिस चले गए। मैं आंटी से नज़रें नहीं मिला पा रहा था, जबकि आंटी मेरी कल रात की करतूत से बेख़बर थीं।

आंटी रसोई में काम कर रही थीं, मैं भी रसोई में खड़ा हो गया, ज़िंदगी में पहली बार मैंने आंटी के जिस्म को गौर से देखा।

उनका गोरा भरा हुआ गदराया सा बदन, लम्बे घने काले बाल जो आंटी के कमर तक लटकते थे, बड़ी-बड़ी आँखें, गोल-गोल बड़े संतरे के आकार की चूचियाँ जिनका साइज़ 34 से कम ना होगा। पतली कमर और उसके नीचे फैलते हुए चौड़े, भारी चूतड़, एक बार फिर मेरे दिल की धड़कन बढ़ गई।

इस बार मैंने हिम्मत करके आंटी से पूछ ही लिया- आंटी, मेरा आज इम्तिहान है और आपको तो कोई चिंता ही नहीं थी, बिना पढ़ाए ही आप कल रात सोने चल दीं..!

‘कैसी बातें करता है राज, तेरी चिंता नहीं करूँगी तो किसकी करूँगी?’

‘झूठ, मेरी चिंता थी तो गई क्यों?’

‘तेरे अंकल ने जो शोर मचा रखा था।’

‘आंटी, अंकल ने क्यों शोर मचा रखा था?’ मैंने बड़े ही भोले स्वर में पूछा।

आंटी शायद मेरी चालाकी समझ गईं और तिरछी नज़र से देखते हुए बोलीं- धत्त बदमाश, सब समझता है और फिर भी पूछ रहा है। मेरे ख्याल से तेरी अब शादी कर देनी चाहिए। बोल है कोई लड़की पसंद?

‘आंटी सच कहूँ मुझे तो आप ही बहुत अच्छी लगती हो।’

‘चल नालायक भाग यहाँ से और जा कर अपना इम्तिहान दे।’

मैं इम्तिहान तो क्या देता, सारा दिन आंटी के ही बारे में सोचता रहा। पहली बार आंटी से ऐसी बातें की थीं और आंटी बिल्कुल नाराज़ नहीं हुईं, इससे मेरी हिम्मत और बढ़ने लगी।

मैं आंटी का दीवाना होता जा रहा था। आंटी रोज़ रात को देर तक पढ़ाती थीं। मुझे महसूस हुआ शायद अंकल आंटी को महीने में दो तीन बार ही चोदते थे। मैं अक्सर सोचता, अगर आंटी जैसी खूबसूरत औरत मुझे मिल जाए तो दिन में चार दफे चोदूँ।

दीवाली के लिए आंटी को मायके जाना था। अंकल ने उन्हें मायके ले जाने का काम मुझे सौंपा, क्योंकि अंकल को छुट्टी नहीं मिल सकी।

टिकट खिड़की पर बहुत भीड़ थी, मैं आंटी के पीछे रेलवे स्टेशन पर रिज़र्वेशन की लाइन में खड़ा था। धक्का-मुक्की के कारण आदमी-आदमी से सटा जा रहा था। मेरा लंड बार-बार आंटी के मोटे-मोटे चूतड़ों से रगड़ रहा था।

मेरे दिल की धड़कन तेज़ होने लगी, हालांकि मुझे कोई धक्का भी नहीं दे रहा था, फिर भी मैं आंटी के पीछे चिपक कर खड़ा था। मेरा लंड फनफना कर अंडरवियर से बाहर निकल कर आंटी के चूतड़ों के बीच में घुसने की कोशिश कर रहा था।

आंटी ने हल्के से अपने चूतड़ों को पीछे की तरफ धक्का दिया, जिससे मेरा लंड और ज़ोर से उनके चूतड़ों से रगड़ने लगा। लगता है आंटी को मेरे लंड की गर्माहट महसूस हो गई थी और उसका हाल पता था लेकिन उन्होंने दूर होने की कोशिश नहीं की।

भीड़ के कारण सिर्फ़ आंटी को ही रिज़र्वेशन मिला, ट्रेन में हम दोनों एक ही सीट पर थे।

रात को आंटी के कहने पर मैंने अपनी टाँगें आंटी की तरफ और उन्होंने अपनी टाँगें मेरी तरफ कर लीं और इस प्रकार हम दोनों आसानी से लेट गए। रात को मेरी आँख खुली तो ट्रेन के नाइट-लैंप की हल्की-हल्की रोशनी में मैंने देखा, आंटी गहरी नींद में सो रही थीं और उनकी साड़ी जांघों तक सरक गई थी।

आंटी की गोरी-गोरी नंगी टाँगें और मोटी मांसल जांघें देख कर मैं अपना संयम खोने लगा। उनकी साड़ी का पल्लू भी एक तरफ गिरा हुआ था और बड़ी-बड़ी चूचियाँ ब्लाउज में से बाहर गिरने को हो रही थीं।

मैं मन ही मन मानने लगा कि साड़ी थोड़ी और ऊपर उठ जाए ताकि आंटी की चूत के दर्शन कर सकूँ। मैंने हिम्मत करके बहुत ही धीरे से साड़ी को ऊपर सरकाना शुरू किया। साड़ी अब आंटी की चूत से सिर्फ़ 2 इंच ही नीचे थी, पर कम रोशनी होने के कारण मुझे यह नहीं समझ आ रहा था की 2 इंच ऊपर जो कालिमा नज़र आ रही थी वो काले रंग की पैन्टी थी या आंटी की बुर के बाल।

मैंने साड़ी को थोड़ा और ऊपर उठाने की जैसे ही कोशिश की, आंटी ने करवट बदली और साड़ी को नीचे खींच लिया।

मैंने गहरी सांस ली और फिर से सोने की कोशिश करने लगा।
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