आठ दिन

Share

[size=150:1kyzppn7][color=#8000BF:1kyzppn7]आठ दिन–पार्ट-2

गतान्क से आगे…………..

ये घर, हमारा घर. 2 साल पहले जब हमने ये घर बनवाया था तो कितने शौक से बनवाया था. किस तरह से तुमने घर की हर एक चीज़ को बड़े देखभाल से खुद डिज़ाइन किया था. कैसे कौन सा कमरा कहाँ बनेगा, किस तरह बनेगा, कितने कमरे होंगे, कौन सा पैंट होगा, कौन से पर्दे, हर चीज़ को तुमने खुद अपने आप शौक से पसंद किया था.

और क्यूँ ना करती, कब्से हम इस घर की आस लगाए बैठे थे. काब्से तुम दिन रात बस अपने घर की बातें किया करती थी. कैसे तुम कहा करती थी के जब अपना घर होगा तो तुम ऐसे सजाओगी, वैसे सजाओगी.

कैसे तुमने पुर घर को ये ध्यान में रख कर बनवाया था के हमारे 2 बच्चे होंगे.

शादी के 6 साल हो जाने के बाद भी तुम बच्चा नही चाहती थी क्यूंकी तुम्हें इस बात की ज़िद थी के तुम अपने बच्चे को जनम अपने घर में दोगि जहाँ वो पल बढ़कर बड़ा होगा.

और हैरत की बात है के कैसे तुमने मुझे फोन पर आखरी बार बात करते हुए कहा था "थॅंक गॉड हमारा कोई बच्चा नही है"

तुम्हें कार में बैठे बैठे थोड़ी देर हो चुकी होगी. टॅक्सी ड्राइवर ने कार का एंजिन और ए.सी. दोनो बंद कर दिए होंगे और तुम्हें अब हल्की हल्की गर्मी महसूस होनी शुरू हो चुकी होगी.

तुम हमेशा बहुत सुंदर थी. बेहद खूबसूरत. इतनी खूबसूरत के कभी कभी मुझे लगता था के तुमने क्यूँ मुझे अपना पति चुना. शकल सूरत में मैं कहीं से भी तुम्हारी मुक़ाबले नही था और कई बार अंजाने में तुमने मुझे इस बात का एहसास कराया भी था.

कैसे तुम हस्ते हस्ते मज़ाक में कह जाती थी के तुम चाहती तो तुम्हें एक से एक खूबसूरत लड़के मिल जाते. कैसे तुम अक्सर मासूमियत से मुझे मेरे चेहरे का एहसास करा देती थी.

पर मैने कभी तुमसे कोई शिकायत नही की. हां मुझ में शायद कमी थी पर किस में नही होती. भगवान ने हर इंसान में अच्छे और बुरे का सही मिश्रण बनाया है. गुण अवगुण सब में होते हैं. मुझ में भी थे.

तुम में भी थे पर कभी मैने तुम्हें उसका कोई एहसास नही कराया. मैं शायद तुम्हारी वो अच्छी साइड ही देखता रहा जिससे मुझे बेन्तेहाँ मोहब्बत था. जिस पर मैं दिल-ओ-जान से मरता था.

कार से बाहर निकल कर अपने आपको धूप से बचाती तुम घर की तरफ बढ़ोगी और दिल ही दिल में सख़्त धूप और गर्मी की अपने आप से शिकायत करोगी. 5 हफ्ते देल्ही से बाहर रह कर तुम भूल चुकी होगी के इन दिनो देल्ही का मौसम कैसा रहता है.

गरम, बहुत गरम.

और ऐसे ही कुच्छ गर्मी शायद मेरी आत्मा के अंदर भी है, मेरी रूह और मेरे दिल में भी जा बसी है. तुम मेरी बीवी हो और मैने कभी तुम्हारे साथ कोई ज़्यादती नही की. कभी अपनी आवाज़ तक तुम्हारे सामने ऊँची नही की. उस वक़्त भी नही जब तुम मेरे सामने पागलों की तरह चिल्ला रही थी के तुम तलाक़ चाहती हो. के तुम मुझसे प्याद नही करती, कभी किया ही नही.

और तब पहली बार मैने तुम्हारी नज़र में सच्चाई देखी थी. अब तक जो मोहब्बत मैं तुम्हारे चेहरे में देखता था वो तो सब धोखा था. तब पहले बार मैने तुम्हारी नज़र में अपने लिए घ्रना देखी थी.

वो पल मैं कभी चाह कर भी भूल नही सकता.

बर्क़ नज़रों को,

बाद-ए-सबा चाल को,

और ज़ुलफ को काली घटा कह दिया,

मेरी आँखों में सावन की रुत आई,

जब दीदा-ए-यार को मैक़दा कह दिया.

मैं कहाँ,

जुर्रत-ए-लाबकूशाई कहाँ,

तौबा तौबा जुनून की ये बेताबियाँ,

रूबरू जिनके नज़रें भी कभी उठती ना थी,

उनके मुँह पर आज उन्हें बेवफा कह दिया.

[/color:1kyzppn7][/size:1kyzppn7]

Share
Posted in Uncategorized
Article By :

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *