आठ दिन

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[size=150:2nospyf0][color=#8000BF:2nospyf0]घर के बाहर न्यूसपेपर्स बिखरे पड़े होंगे. मेलबॉक्स में पिच्छले कयि दिन के लेटर पड़े होंगे. ये सब देख कर शायद तुम्हे कुच्छ अजीब लगे. और शायद तुम्हें थोड़ी बेचैनी हो, या थोड़ा गिल्टी भी फील हो. क्यूंकी तुम जानती हो के घर इन सब चीज़ों को लेकर तुम्हारा पति कितना पर्टिक्युलर था.

तुम्हारा वही पति जिसके लिए घर की सॉफ सफाई कितना मतलब रखती थी. और सिर्फ़ घर के अंदर की ही नही बल्कि घर के बाहर की भी सफाई.

और आज सोचता हूँ तो शायद हसी भी आती है के कभी मेरी यही बातें तुम्हें कितनी ज़्यादा पसंद थी. कितनी मोहब्बत करती थी तुम मेरी इन्ही आदतों से जो बाद में तुम्हें परेशान करने लगी थी, कैसे पहली बार जब तुमने मेरा कमरा देखा तो ये कहा था के ये दूसरे लड़को के कमरो जैसा गंदा नही बल्कि बहुत सॉफ है.

और बाद में तुम्हें मेरी यही आदत और सफाई पर तुम्हें टोकना कितना बुरा लगने लगा था.

तो तुम बाहर बैठी घर के गंदी हालत को देखोगी और दिल ही दिल में अपने आप से कहोगी के तुम इसके लिए ज़िम्मेदार नही हो. पाँच हफ्ते हो जाएँगे तुम्हें गये हुए और इन पाँच हफ़्तो में सिर्फ़ 2 बार तुमने मुझसे फोन किया और हर बार मुझे बस यही कहा के मैं तुम्हें जाने दूँ.

कहा क्या बल्कि तुमने तो मुझसे हाथ जोड़कर भीख ही माँग ली के मैं तुम्हें भूल जाऊं और जाने दो. जैसे तुम्हें मुझसे भीख माँगने की कोई भी ज़रूरत थी.

घर के बाहर मेरी कार देख कर तुम समझ जाओगी के मैं घर पर ही हूँ और शायद इस बात का तुम्हें अफ़सोस भी हो क्यूंकी सारे रास्ते तुम यही उम्मीद और दुआ करती आई होगी के मैं तुम्हें घर पर ना मिलूं और तुम चुप चाप अपना समान लेकर निकल जाओ.

के तुम्हें मेरा सामना ना करना पड़े.

पर शायद तुम ये भूल चुकी होगी के मैने तुमसे ये वादा किया था के मैं तुम्हें उस वक़्त घर पर ही मिलूँगा ताकि हम एक आखरी बार मिल सकें और अपने डाइवोर्स पेपर्स पर साइन कर सके. ताकि हम सारे सेटल्मेंट्स निपटा सकें.

हैरत की बात है के साथ जीने मरने की कस्में अब सेटल्मेंट जैसे एक शब्द में सिमट गयी.

घर के बाहर खड़ी कार हमारी कार है, ये घर हमारा घर है. क्यूंकी ये सारी प्रॉपर्टीस में तुम बराबर की हिस्सेदार हो. यूँ तो तुम एक हाउसवाइफ थी और घर का सारा खर्चा मेरे ज़िम्मे था, ये सब चीज़ें मैने खुद खरीदी थी पर फिर भी मैने इन सब चीज़ों के तुम्हें भी बराबर मालिक बनाया है क्यूंकी तुम मेरी बीवी हो, मेरी हमराज़ हो, मेरी हम-सफ़र हो, मेरी अर्धांगिनी हो, मेरी बेटर हाफ हो.

क्यूंकी मैं तुमसे बे-इंतेहाँ मोहब्बत करता हूँ.

एरपोर्ट से घर तक तुम पूरे रास्ते सोचती हुई आई होंगी. मुझसे क्या कहना है, क्या बात करनी है, सारी लाइन्स तुमने एक बार फिर रिहर्स की होंगी. तुम जानती हो के मैं तुमसे कहूँगा के तुम अपना इरादा बदल दो और सब भूल कर एक बार फिर घर आ जाओ और तुम जवाब में अपनी लाइन रिहर्स करती आओगी. के मुझे कैसे समझा है के अब सब ख़तम हो चला है. के अब तुम वापिस कभी नही आ सकती सिवाय इस एक घंटे के जबके तुम अपना समान लेने आओगी.

सिवाय एक घंटे के जब तुम आओगी भी तो वापिस चले जाने के लिए.

तुम मुझसे कहोगी के मैं तुम्हें माफ़ कर दूँ और के तुम बहुत शर्मिंदा हो. के तुम्हें बहुत अफ़सोस है.

हैरत की बात है के सॉफ जीने मरने की कस्में शर्मिंदगी और अफ़सोस जैसे लफ़्ज़ों में सिमट जाएँगी.

वफ़ा की आखरी हद से गुज़ार लिया जाए,

सितमगरो के मोहल्ले में घर लिया जाए,

जिधर निगाह उठे आप ही के जलवे हों,

जिए तो ऐसे जिएं वरना मर लिया जाए…..

क्रमशः…………..

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