कुच्छ भी नहीं ….Hindi Love Story

[size=150:3bbn9l0o][color=#8000BF:3bbn9l0o]कुच्छ भी नहीं ….Hindi Love Story

दिल में अब दर्द-ए-मोहब्बत के सिवा कुच्छ भी नही,

ज़िंदगी मेरी अब तेरी चाहत के सिवा कुच्छ भी नही………

दुल्हन के जोड़े में सजी वो बला की खूबसूरत लग रही है. और सच कहूँ तो मेरा ये कहना ही जैसे एक गुनाह जैसा है, उसके साथ मेरी ना-इंसाफी है. कहना तो ये चाहिए के उसके तंन पर सज कर वो दुल्हन का जोड़ा बहुत खूबसूरत लग रहा है. एक मामूली लाल रंग का कपड़ा आज उसका पेरहन बनकर बेश-कीमती हो गया है.

अब तो जैसे याद भी नही के मैं कब्से उसे चाहता हूँ, कब्से उसे पाने की तमन्ना दिल में लिए हुए हूँ.

जहाँ तक याद की हद जाती है, वहाँ तक बस एक उसकी ही सूरत नज़र आती है. ज़िंदगी शुरू उसके दामन से होती है इस ख्वाहिश के साथ के आखरी हिचकी भी उसके बाहों में आए और कफ़न भी उसका दामन बने.

"तुम हमेशा मेरे साथ क्यूँ खेलते हो?"

बचपन में जब वो मासूमियत से ये सवाल किया करती थी तो मुझसे जवाब देते नही बनता था. सच तो ये था के उसके सवाल का जवाब मेरे पास था ही नही. उस छ्होटे से मासूम लड़के को खुद ही ये कहाँ पता था के वो क्यूँ हर पल उस मासूम चेहरे को तकता रहता है.

क्यूँ बे-इख्तेयार उस मासूम सी गुड़िया के पास चला आता है और क्यूँ उसके गुड्डे गुड़िया के खेल में शामिल रहता है.

"तू लड़की हो गया है, गुड़िया से खेलता है. हम तेरे साथ नही खेलेंगे"

दोस्तों के मज़ाक बनाने का सिलसिला बचपन में ही शुरू हो गया था. और वो सिलसिला जो शुरू हुआ तो फिर कभी ख़तम हुआ ही नही, चलता ही रहा और उसके साथ चलता रहा मेरी दीवानगी का सिलसिला. बचपन जवानी में तब्दील हुआ तो ये समझ तो आ गया के मैं क्यूँ हर पल उसके साथ की ख्वाहिश, उसकी नज़दीकी की तलब रखता हूँ पर दिल से वो कसक कभी गयी नही.

उसकी चाहत रग रग में लहू बनकर दौड़ती रही और उसकी शकल एक तस्वीर

बनकर मेरे कमरे की दीवार के साथ मेरी नज़रों से होती मेरी रूह में जा बसी.

"जब हम बड़े होंगे तो मैं तुमसे शादी कर लूँगा फिर हम हमेशा साथ में गुड़िया से खेला करेंगे"

10 साल की उमर में मेरे लब से निकले वो अल्फ़ाज़ कब एक ख्वाब बनकर आँखों में जा बसे जैसे खबर ही नही हुई. गुड्डे गुड़िया का खेल तो ख़तम हो गया पर उस वक़्त कहे गये चंद अल्फ़ाज़ एक वादा बनकर हम दोनो को जोड़ गये, हमारे दिलों को जोड़ गये, धड़कन को जोड़ गये.

मैं तेरी बारः-गाह-ए-नाज़ में क्या पेश करूँ,

मेरी झोली में मोहब्बत के सिवा कुच्छ भी नहीं ……

"क्या कर सकते हो मेरे लिए?"

उसने मासूमियत से एक बार जो सवाल किया तो लफ्ज़ जैसे कम पड़ गये ये बताने के लिए के मैं उसके लिए क्या कुच्छ करना चाहता हूँ. समझ ही नही आया के कहाँ से शुरू करूँ और कहाँ ख़तम. कैसे उन चीज़ों की फेहरिस्त बनाऊँ जो मैं उसके सुपुर्द करना चाहता हूँ.

कभी हाथ उठ गये फलक की तरफ ये इशारा करते हुए के वो कहे तो आफताब की रोशनी उसके गालों में भर दूँ, महताब की चाँदनी उसके आँचल में समेट लाऊँ, सियाह रात की सियाही उसकी आँखों के डोरे बना दूं और लाल सहर की लाली उसके लबों पर सज़ा दूं. तो कभी यूँ ख्वाहिश हुई के सीना चीर कर दिल उसके

हवाले कर दूं.

कभी चाहा के उसके पैरों तले हर फूल सज़ा दूं तो कभी खुद फूल बनार उसकी कदम-बोसी कर लूँ.

तेरी महफ़िल से जो उठू तो बता फिर कहाँ जाऊं,

मेरा काम तेरी इबादत के सिवा कुच्छ भी नहीं ……

बस अड्डे के पास कल्लू की चाई की दुकान आज भी वहीं हैं. वो 2 कुर्सियाँ और एक मेज़ उसी सलीके से रखी हुई है जिस सलीके से वो कभी हमारे इंतेज़ार में होती थी.

"परेशान करने को बुलाया है मुझे यहाँ? छेड़ रहे हो, भाग जाओ ….."

अदा से इठलाके वो उसका मुझसे वो शिकायत करना और उस गीले शिकवे में छुपि वो मासूमियत बार बार मुझे इस बात के लिए मजबूर करती के मैं आगे बढ़कर उसका माथा चूम लूँ, उसके हाथ थाम लूँ और फिर बयान करूँ, बताऊं उसे, के मैं किस क़दर उसे इश्क़ में फ़ना हूँ. बताऊं के मैं क्यूंकर बे- इख्तियार सा उसकी एक झलक पाने को दिल थामे उसकी राह में मुतज़ीर रहता हूँ.

समझाऊं उसे के उसके वजूद से मेरा वजूद क़ायम है और जो वो नही तो मेरी शख्सियत का कोई मतलब नही. के मेरी हर सहर उसके ताज़किरे से शुरू होती है और शाम तक का मेरा सफ़र उसकी आवाज़ सुनने की बेक़ारारी में गुज़रता है.

आए खुदा मुझसे ना ले मेरे गुनाहों का हिसाब,

मेरे पास अश्क़-ए-नदमत के सिवा कुच्छ भी नही ….

हर तरफ रंग बिरंगे कपड़े पहने, सजे धजे लोग खुशियाँ माना रहे थे. कुच्छ उसके अपने थे और कुच्छ यूँ ही बुलावे पर उसकी खुशी में शामिल होने आ गये थे.

आज उसकी शादी थी और दुल्हन बनी किसी गुड़िया की तरह सजी हुई वो मजलिस के ठीक बीच में बैठी थी. लोग आ रहे थे और उसके सामने अपना लाया तोहफा रख कर उसकी उस मुबारक दिन की मुबारकबाद दे रहे थे और उसकी आने वाली ज़िंदगी के लिए दुआ.

आज उसको देख कर ये एहसास हुआ के लाल रंग उसपर बहुत फबता था. जाने कैसे इतने लंबे अरसे में इस बात से मैं पूरी तरह गाफील रहा. क्या इस लिए के उसने कभी मेरे साथ मेरे सामने लाल रंग पहना नही या इसलिए के मुझे हर रंग में वो इस क़दर हसीन लगती थी के हर रंग की रंगत मेरी नज़र से पोषीदा रही, बे-असर रही.

और फिर एहसास हुआ के लाल रंग उसपर कितना फॅब रहा है. क्या इसलिए के इस लाल रंग में कुच्छ ख्वाबों का खून शामिल है, के ये लाल रंग कुच्छ बेकार उम्मीदों की अश्क़ो में भीगा हुआ है, के ये लाल रंग अपने आप में कुच्छ वादों का का जनाज़ा समेटे हुए है.[/color:3bbn9l0o][/size:3bbn9l0o]

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