एक बार ऊपर आ जाईए न भैया compleet

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[size=150:to0rzqc7][color=#8000BF:to0rzqc7] एक बार ऊपर आ जाईए न भैया–1

स्वीटी मेरी सगी बहन है मुझसे लगभग ८ साल छोटी। मेरा नाम गुड्डू है, उम्र २६ साल। मेरे पिताजी चावल और दाल के थोक व्यापारी थे। उनके गुजर जाने के बाद अब मैं उस काम को देखता हूँ। हम किशनगंज बिहार में रहते हैं। मम्मी की मृत्यु चार साल पहले हीं हो गई थी। घर में स्वीटी के अलावे मेरी दो और बहने हैं, २३ साल की प्रभा और २० साल की विभा। प्रभा की शादी हाल हीं में हुई है, विभा अभी बी०ए० कर रही है, जबकि स्वीटी बारहवीं पास की है। १८ साल की स्वीटी पढ़ाई में बहुत तेज है और शुरु से ईंजीनियर बनना चाहती थी। मैं भी उसे प्रोत्साहित करता रहता था सो वो इधर-ऊधर कम्पटीशन देते रहती है। यह कहानी मेरे स्वीटी के बीच हुए चुदाई की शुरूआत की बात आप सब को बताएगी, कैसे और किन हालात में हम दोनों एक दूसरे को चोदने लगे।

पहले मैं अब स्वीटी के बारे में आपको बताऊँ। स्वीटी ५’ की छरहरे बदन की गोरी लड़की है। सुन्दर है, जवान है और खुब जवान है। पढ़ाई के चक्कर में आँखों पर चश्मा लग गया है, फ़िर भी आकर्षक दिखती है और राह चलते लोग एक बार जरूर उसको गौर से देखते हैं हालाँकि वो कभी किसी को लिफ़्ट नहीं देती है। एक साईकिल ले कर वो दिन भर कभी ट्युशन तो कभी कोचिंग में हीं लगी रहती है। खैर कई सोच-विचार के बाद उसका नाम कोचीन के एक ईंजीनियरींग कौलेज की सूची में आ गया और अब हमें एक सप्ताह के भीतर वहाँ उसका नाम लिखवाना था। करीब ३५०० कि०मी० का सफ़र था, एक दिन और दो रात का। शाम को ५ बजे ट्रेन पर बैठिए तो वो रात, फ़िर दिन और फ़िर रात के बाद अगली सुबह करीब ४ बजे पहुँचिए। आनन-फ़ानन में किसी तरह हम लोग को एक आर०ए०सी और एक वेटिन्ग का टिकट मिला ट्रेन में, यानी हम दोनों को एक हीं बर्थ था और हम दूसरे टिकट के लिए इंतजार भी नहीं कर सकते थे।

विभा प्रभा के घर गई हुई थी तब, सो सारी तैयारी भी मुझे हीं करानी पड़ी। सच बताउँ तो इसी तैयारी के समय मुझे पता चला कि मेरी सबसे छोटी बहन कितनी मौड और स्मार्ट है। मेरे लिए वो घर पे हमेशा एक बच्ची जैसी ही थी। स्वीटी का सपना सच होने जा रहा था और वो बहुत खुश थी। दो दिन उसने बाजार से सामान खरीदने में लगाए। एक दिन मैं भी साथ था। उस दिन स्वीटी ने जो सामान खरीदे उसी से मुझे अहसास हुआ कि मेरी सबसे छोटी बहन भी जवान हो गई है।

ऐसा नहीं है कि मैं भोला-भाला हूँ, इस उम्र तक मैं ७-८ लड़की को चोद चुका था। कुछ दोस्त थी, और २ कौल-गर्ल…। पर घर पर बहनों पर कभी ऐसी नजर नहीं डाली थी। कभी सोचा भी नहीं कि बाकी की दुनिया मेरी बहनों के नाम पर मूठ भी मारती होगी। मैंने हमेशा अपनी बहनों को सती-सावित्री हीं माना था। आज की खरीदारी के साथ हीं मैंने अपनी बहन को अब एक मर्द की नजर से देखा तो लगा कि यार यह तो अब पूरा माल हो गई है, १८ साल की उमर, और सही उभारों के साथ एक ऐसा बदन जो किसी भी मर्द को अपना दीवाना बना सकता था। उसकी उस रोज की खरीदारी में लिपिस्टीक, काजल जैसे हल्के मेकअप के सामान के साथ सैनिटरी नैपकिंस और अंडरगार्मेन्ट्स भी था। मैंने स्वीटी को पहले वैसे कुछ मेकअप करते देखा नहीं था, पर अब जब उसका सच सच होने जा रहा था तो अब शायद वो भी एक लड़की की तरह जीना चाहती थी, पहले वो एक पढ़ाकू लड़की की तरह जीती थी। उसी दिन उसने तीन सेट ब्रा-पैन्टी भी खरीदी जौकी की दूकान से। ८० साईज की लाल, गुलाबी और नीली ब्रा और फ़िर उसी से मौच करता हुआ पैंटी भी। इसके अलावे उसने एक पैकेट स्ट्रींग बीकनी स्टाईल की पैन्टी खरीदी, जिसमें लाल, काली और भूरी ३ पैंटी थी। मुझे तो पता भी नहीं था कि पैंटी की भी इतनी स्टाईल हमारे किशनगंज जैसे शहर में मिलती है। घर लौटते हुए रास्ते में स्वीटी ने वीट हेयर-रिमुवर क्रीम की दो पैक लीं। मैंने टोका भी कि दो एक साथ क्या करोगी, तो उसने कहा कि एक तो यहीं खोल कर युज कर लेगी और बाकि विभा के लिए छोड़ देगी और नया पैक साथ ले जाएगी।

अगली शाम हमें ट्रेन पकड़ना था, और मैं दुकान की जिम्मेदारी स्टाफ़ को समझा चुका था। मैं अपना पैकिंग कर चुका था और बैंक के काम से निकलने वाला था कि स्वीटी आई और मेरे शेविंग किट के बारे में पूछी। मैं एक-दो दिन छोड़ कर शेव करता था सो मैंने किट को सामान में पैक कर दिया था। मैंने झल्लाते हुए पूछा कि वो उसका क्या करेगी, तो बड़ी मासूमियत से स्वीटी ने अपने हाथ ऊपर करके अपने काँख के बाल दिखाए कि यही साफ़ करना है रेजर से। वो एक स्लीवलेस कुर्ती पहने हुए थी। मेरे कुछ कहने से पहले बोली, "इतना बड़ा हो गया है कि क्रीम से ठीक से साफ़ नहीं होगा, सो रेजर से साफ़ करना है, फ़िर इतना बड़ा होने हीं नहीं देंगे। दीदी की शादी के समय साफ़ किए थे अतिंम बार, फ़िर पढ़ाई के चक्कर में मौका हीं नहीं मिला इस सब के लिए।" मैंने भी मुस्कुराते हुए अपना शेविंग किट उसे दे दिया।

शाम को जब मैं घर लौटा तो स्वीटी बिल्कुल बदली हुई थी। उसने अपनी भौं भी सेट कराई थी। और मुझे और दिन से ज्यादा गोरी दिख रही थी। मैंने ये कहा भी तो वो बोली, "सब वीट का कमाल है"। तब मुझे पता चला कि उसने अपने हाथ-पैर आदि से बाल साफ़ किए हुए थे। मैंने हँसते हुए कहा, "दिन भर खाली बाल साफ़ की हो न…"। दिन भर नहीं अभी शाम में दो घन्टे पहले और फ़िर अपने कमरे से एक लपेटा हुआ अखबार ले कर आई और उसको मेरे सामने खोली। उसमें ढ़ेर सारे बाले थे और रूई जिससे वो वीट को पोछी थी। "इतना सब मिल कर काला बनाए हुए था हमको", वो बोली। मेरी नजर उस अखबार पर थी जहाँ काले-काले खुब सारे बाल थे। मुझे पता चल गया था कि इन बालों में उसकी झाँट भी शामिल है। वो जिस तरह से अपनी बहादुरी दिखा रही थी, मैंने उसको जाँचने के लिए कहा, "इतना तो बाल तुम्हारे काँख में नहीं दिखा था सुबह जब तुम रेजर लेने आई थी?" वो अब थोड़ा संभली, उसको अब अपनी गलती का अंदाजा हुआ था शायद सो वो बोली, "इतना हिसाब किसी लड़की से नहीं लेना चाहिए भैया" और अपनी आँखें गोल-गोल नचा दी और सब डस्टबीन में डालने चली गई।

अगले दिन हम समय से ट्रेन में बैठ गए। ए०सी टू में हमारा सीट था। पूरी बौगी में साऊथ के टुरिस्ट लोग भरे थे, एक पूरी टीम थी जो गौहाटी, आसाम से आ रही थी। पूरी बौगी में हम दोनों भाई-बहन के अलावे एक और परिवार था जो हिन्दी भाषी था। संयोग की उन लोगों की सीट भी हमारे कंपार्टमेन्ट में हीं थी। चार सीट में नीचे की दो और ऊपर की एक उन लोगों की थी और एक ऊपर की हमारी। वो लोग सिलिगुड़ी में रहने वाले माड़वाड़ी थे। पति-पत्नी और एक बेटी जो स्वीटी की उमर की हीं थी। हम सब को तब आश्चर्य हुआ जब पता चला कि वो लड़की भी उसी कौलेज में नाम लिखाने जा रही है जहाँ स्वीटी जा रही है। फ़िर तो परिचय और घना हो गया। वैसे भी पूरी बौगी में सिर्फ़ हम हीं थे जो आपस में बात कर सकते थे, बाकि के सब तो अलग दुनिया के लोग लग रहे थे, बोल-चाल, खान-पान, रहन-सहन सब से। स्वीटी और उस लड़की गुड्डी (एक और संयोग, मैं गुड्डू और वो गुड्डी) में जल्दी हीं दोस्ती हो गई और वो दोनों ऊपर की सीट पर बैठ कर आराम से बातों में खो गई। मैं नीचे उस बुजुर्ग जोड़े के साथ बात करने लगा। ट्रेन समय से खुल गई और करीब ८:३० बजे हम सब खाना खा कर सोने की तैयारी करने लगे। सफ़र लम्बा था सो उस मड़वाड़ी जोड़े ने अपना कपड़ा बदल लिया था ट्रेन में घुसते हीं। उनकी बेटी भी टायलेट जा कर एक नाईटी पहन कर आ गई तो मैंने भी स्वीटी को कहा की वो भी चेन्ज कर ले।

मैंने अपने जीन्स पैण्ट के नीचे एक हाफ़ पैण्ट पहना हुआ था सो मैंने अपने जीन्स उतार दिए और फ़िर शर्ट भी खोल कर गंजी और हाफ़ पैण्ट में सोने के लिए तैयार हो गया। मैं घर पर भी ऐसे हीं कपड़ों में सोता था। मड़वाड़ी दम्पत्ति अपने-अपने बिस्तर पर लेट चुके थे। बौगी की लाईट लगभग बन्द हीं हो चुकी थी। सिर्फ़ हमारे कंपार्टमेन्ट में लाईट जली हुई थी। मेरी नजर गुड्डी पर टिकी थी और मैं अपने दिमाग में उसकी फ़ीगर का अंदाजा लगा रहा था। जीन्स-टौप में मैंने उसको देखा हुआ था पहले, अब एक ढ़ीले से नाईटी मे उसको घूर रहा था पीछे से। वो कुछ समान ठीक कर रही थी, और मुझे वो जब नीचे झुकती तो उसकी चुतड़ का आभास हो जाता। वो मेरे बहन से ज्यादा वजन की थी, पर मोटी नहीं थी। स्वीटी का फ़ीगर इलियाना डिक्रुज की तरह था, जबकि गुड्डी थी सोनाक्षी सिन्हा टाईप। वैसे भी मड़वाड़ी लड़कियों की गाँड़ थोड़ी चौड़ी होती ही है। जब वो ऊपर की बर्थ पर चढ़ने लगी तो उसकी नाईटी काफ़ी ऊपर उठ गई और उसकी गोरी-गोरी जाँघों की एक झलक मुझे मिल गई। मैं सोचने लगा कि अगर उस सीट के नीचे मैं सोया होता जहाँ उसकी माँ सोई थी तो शायद मुझे उसकी पैन्टी भी दिख जाती। तभी मेरे दिमाग में आया कि आज स्वीटी मेरे साथ सोने वाली है। यह शायद पहला मौका था जब वो मेरे साथ सोती, नहीं तो दो बड़ी बहन के होते उसको तो कभी मेरे साथ सोने का मौका हीं नहीं मिला था।

मैं यही सब सोच रहा था कि स्वीटी आ गई। स्वीटी ज्यादातर नाईट-सूट, पैजामा-शर्ट पहन कर सोती थी, पर आज वो नाईटी पहन कर टायलेट से आई। शायद गुड्डी का असर था। वो अब अपने बैग में अपना सलवार सूट डाला तो मैंने देखा कि उसने एक सफ़ेद ब्रा और काली पैन्टी भी साथ में भीतर रखा, यानि अभी स्वीटी सिर्फ़ एक नाईटी में थी। ओह भगवान…. मेरे दिमाग ने कहा। अब हम दोनों भी ऊपर की अपनी सीट पर आ गए। फ़िर मैंने ही तय किया हम अपना सर अलग-अलग साईड में रखें। गुड्डी ने हम दोनों को गुड-नाईट कहा और फ़िर दीवार की साईड करवट ले ली। मेरी जल्दी हीं मुझे लग गया कि स्वीटी वैसे सोने में आराम नहीं महसूस कर रही है। गुड्डी भी यह महसूस कर रही थी। वो ही बोली, "स्वीटी तुम भी भैया की साईड ही सर कर के सो जाओ, वो थोड़ा कमर को झुका लेंगे तो उनके पैर और सर के बीच में ज्यादा जगह हो जाएगा और तुम इतनी लम्बी हो नहीं तो आराम से उस बीच में सो सकोगी।" उसके पापा तो खर्राटे लेने लगे थे और मम्मी थोड़ा थकी हुई थी सो वो सो चुकी थी। करीब दस बज रहा था तब। स्वीटी भी अब उठी और मेरे सर की तरफ़ सर करके लेटी। उसके उठने के क्रम में उसका नाईटी पूरा ऊपर हो गया और उसकी जाँघ और बूर के दर्शन मुझे हो गए। मेरा दिल किया धक्क… और लन्ड ने एक ठुनकी मार दी। मैं एक दम से साईड मे खिसक गया था जिससे कि स्वीटी को ज्यादा जगह मिल सके सोने के लिए।

जल्दी हीं हम सो गए, थोड़ा थकान भी था और थोड़ा ट्रेन के चलने से होने वाले झुले के मजे की वजह से। करीब १ बजे रात को मुझे पेशाब लगा तो मैं जागा। मैं जब लौट कर आया तो स्वीटी आराम से पूरे सीट पर फ़ैल गई थी। मैंने उसको एक करवट किया और फ़िर उसी करवट हो कर उसके पीछे लेट गया। मेरी नींद अब गायब हो चुकी थी। पेशाब लगा हुआ था सो लन्ड में वैसे भी तनाव आया हुआ था। अब यह हालत…मन किया कि एक बार जा कर मूठ मार आउँ कि लन्ड ढ़ीला हो जाए। पर तभी स्वीटी थोड़ा हिली और उसका चुतड़ मेरे लन्ड से चिपक गया। मैंने अपने हाथ फ़ैला रखे थे सो वो नींद में ही मेरे बाँह पर अपना सर रख दी और मेरी तरफ़ घुम गई। उसकी खुले गले की नाईटी से उसकी चूचियों का ऊअपर का हिस्सा अब दिखने लगा था। मेरे लिए अब मुश्किल था सोना, फ़िर भी मैंने उसको बाहों से लपेट कर सोने की कोशीश की। इसके बाद अचानक हीं वो ऊठी कि "आ रहे हैं टायलेट से…" और नीचे चली गई। स्वीटी नीचे उतरी और इसके कुछ समय बाद गुड्डी वापस आ गई, उसने मुझे देखा, फ़िर धीरे से मेरे कान के पास बोली, "एक लड़की के साथ कैसे सोया जाता है पता नहीं है क्या?" मैं चुप था तो वो ही बोली, "एक बार चिपका लीजिए वो थोड़ी देर में शान्ति से सो जाएगी। नहीं तो उसको नींद आ भी जाए, आपको नींद अब नहीं आएगी तनाव की वजह से।" तभी स्वीटी लौट आई, तो वो "बेस्ट और लक…" बोल कर अपने बर्थ पर चढ़ गई, और स्वीटी अपने बर्थ पर।

मैंने गुड्डी का सब इशारा समझ लिया था पर एक हिचक थी। मैंने सोचा कि एक बार देखते हैं वैसे सो कर, सो मैंने स्वीटी को अपनी तरफ़ घुमा लिया और फ़िर उसके चेहरे को सहलाने लगा। गुड्डी की तरफ़ मेरी पीठ थी। पर मुझे पता था कि वो सब देख रही होगी। यह सब सोच मेरे लन्ड को और बेचैन किए जा रहा था। मैं जब स्वीटी की कान के नीचे सहलाया तो वो मेरे से चिपक गई, बहुत जोर से। मेरा खड़ा लन्ड अब उसकी पेट में चुभ रहा था। स्वीटी हल्के हाथ से मेरे लन्ड को थोड़ा साईड कर के मेरे से और चिपकी। जब उसने बेहिचक मेरे लन्ड को अपने हाथ से साईड किया तो मुझे हिम्मत आई। मैंने धीरे से कहा, "सहलाओ ना उसको, थोड़ी देर में ढ़ीला हो जाएगा… नहीं तो रात भर ऐसे ही चुभता रहेगा तुम्हे, और हमको भी नींद नहीं आएगी।" वो अपना चेहरा उठाई और मेरे होठ से अपने होठ मिला दी, साथ हीं अपना बाँया हाथ मेरे हाफ़ पैन्ट के भीतर घुसा दिया। अगले पल मेरा लन्ड उसकी मुट्ठी में था। मैं उसको चुम रहा था और वो मेरा लन्ड हिला रही थी। गुड्डी के बर्थ से करवट बदलने की आवाज आई तो मैं पीछे देखा, स्वीटी भी अपना सर ऊपर की यह देखने के लिए कि मैंने चुम्बन क्यों रोका। गुड्डी बर्थ पर बैठ गई थी। हम दोनों भाई-बहन को देखते देख उसने हमें एक फ़्लाईग किस दिया। स्वीटी अब सीधा लेट गई। मेरा खड़ा लन्ड अब उसकी जाँघ से चिपका हुआ था। मैंने अब उपर से उसके होठ चूमे, तो उसने अपने जीभ को मेरे मुँह में घुसा दिया। गुड्डी अब हमारी तरफ़ पीठ घुमा कर लेट गई।

उसने वैसे भी मेरी बहुत मदद कर दी थी। मैं स्वीटी की चुचियों को नाईटी के ऊपर से हीं मसल रहा था और होठ चुम रहा था। उसने मेरे हाथ को अपने जाँघ पर रख कर मुझे सिग्नल दे दिया। फ़िर मैंने उसकी नाईटी उठा दी और उसके जाँघ सहलाने लगा। मक्खन जाँघ था उसका, एक दम ताजा हेयर-रिमुवर से साफ़, चिकना। बिना कुछ सोचे मैंने अपना हाथ थोड़ा और भीतर घुसा दिया। फ़िर उसके बिना झाँटों वाली चिकनी बूर की मुलायमियत को महसूस किया। स्वीटी की आँख बन्द थी। मैं जब ऊँगली से उसकी बूर की फ़ाँक सहला रहा था तब वो खुद अपना जाँघ खोल दी और मैंने अपना एक ऊँगली बूर की छेद में घुसा दिया। वो फ़ुस्फ़ुसाते हुए बोली, "एक बार ऊपर आ जाईए न भैया, फ़िर हम दोनों को चैन हो जाएगा और नींद भी आ जाएगी।" चैन वाली बात सही थी, पर मुझे लग रहा था कि स्वीटी कुँवारी है, यहाँ ऐसे सब के बीच किसी कुँवारी लड़की की सील कैसे तोड़ी जा सकती है। मैंने उसके कान में कहा, "ऊपर-ऊपर ही कर लेते हैं, यह सही जगह नहीं है पहली बार तुमको दर्द भी होगा और खून भी निकलेगा थोड़ा सा।" वो फ़ुस्फ़ुसाई, "ऐसा कुछ नहीं होगा भैया, "सब ठीक है… आप बेफ़िक्र हो कर ऊपर आ जाईए। वो सब दर्द हम पहले ही झेल लिए है।" मैं अब सन्न…. पूछा"कौन…?, कब…?" स्वीटी बुदबुदाते हुए बोली, "वो सब बाद मैं पहले अभी का काम, वैसे भी पूरा बौगी में सब लोग सोया हुआ है, अब तो गुड्डी भी दुसरे करवट है"।

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