ये दिल … एक पंछी – hindi sex story

निशा की शादी हुये पांच वर्ष से अधिक हो चुका था। अब वो पच्चीस वर्ष की हो चुकी थी। पति सरकारी नौकरी में थे। सब कुछ साधारण सा चल रहा था। बस मूड होता था तो वो महीने में दो तीन बार सम्भोग कर लिया करते थे। पर एक साल पहले सरकारी टूर के दौरान एक दुर्घटना में वो घायल हो कर अपनी एक टांग गंवा बैठे थे। उससे उनकी यौन-क्षमता भी प्रभावित हुई थी, अब वे सम्भोग करने में सक्षम नहीं थे। उनके लिंग में उत्थान ही नहीं होता था।

इतने सालों के बाद अब तो सभी कुछ साधारण सा हो चुका था। राजेश्वर अब तो रोज की तरह ऑफ़िस जाने लगे थे। निशा तो घर में अधिकतर बोर ही हुआ करती थी। ना तो कोई चुदाई, ना ही रंगीली रातें … बस टीवी देखना और पड़ोस की औरतों से यहाँ की, वहाँ और वहाँ की यहाँ करना… !

जी हाँ, आम औरतों की तरह निशा की आदतें भी होती जा रही थी। पर सच मानिये, निशा इस तरह की महिलाओं में नहीं थी। उन दिनों प्राईवेट पढ़ाई करने वालों का एडमिशन हो रहा था। निशा के भी मन में आया कि अब एम ए भी कर डालूँ। उसे इस सम्बन्ध में अधिक नहीं मालूम था सो वो पास के एक स्कूल में चली आई। सोचा कि वहाँ की अध्यापिकाओं से जानकारी ले लूँगी।

स्कूल में संयोग से उसकी जान पहचान वाली महिला मिल भी गई। पर उसकी उस समय क्लास था सो उसने एक अध्यापक से मिलवा दिया। उसका नाम विक्रम था… उसने उसे कैसे क्या करना है सब बता दिया था। फिर उसका मित्र विवेक भी आ गया था। निशा को तो समझने में सच में बहुत उलझन सी महसूस हो रही थी, उसके चेहरे से विवेक ने तो भांप भी लिया था…

“अच्छा निशा जी ! आप तो हमारे साथ चलना, हमें भी तो फ़ार्म भरना है।” विवेक ने अपनी बात रखी।

“तो कब चलें?”

“बस दो बजे छुट्टी हो जायेगी, मैं अपनी कार ले आऊँगा, फिर चल चलेंगे !”

“जी ! आपका बहुत बहुत धन्यवाद, मैं आपकी इन्तजार करूँगी।”

विवेक अपनी कार लेकर करीब तीन बजे निशा के घर पर आ गया था। निशा ने अपनी जीन्स और टॉप पहन लिया था तो अब वो एक मॉडर्न लड़की लग रही थी। वो बाहर निकल आई।

“सुनिये ! वो निशा जी है क्या?” विवेक ने कार में से गर्दन निकाल कर पूछा।

“हाँ है …!!” वो मुस्कराई।

“कहना कि विवेक और विक्रम आये हैं।”

“पता है… दरवाजा तो खोलो…!”

“पर वो निशा जी को आना था…!”

“क्या है? आप तो बस ! पहचानते ही नहीं है … मैं ही तो निशा हूँ…”

वो दोनों उस खूबसूरत सी बला को देखते ही रह गये… फिर हंस पड़े।

“कैसे पहचानते निशा जी … कहाँ वो साड़ी में लिपटी हुई बहनजी… और कहाँ…?”

“बस बस … अब चलो तो …” निशा हंसते हुए बोली।

वे सभी ऑफ़िस से फ़ार्म ले आये थे और और उसे अब भरना बाकी था। फोटो लगाना था … फ़ीस का हिसाब करना था। वे सभी फ़ार्म लेकर घर लौट आये।

‘आप दोनों शाम का भोजन हमारे साथ करना, फिर ये फ़ार्म भी भर लेंगे।” निशा ने औपचारिकता निभाते हुये कहा।

विक्रम और विवेक तो जैसे निशा को छोड़ना ही नहीं चाहते थे।

पर शाम को भोजन का न्यौता पाकर वे दोनों ठण्डी आहें भरते हुये चले गए।

“कितने भले है दोनों… सभ्य और सलीके वाले …” सोचते हुए, फिर मुस्करा कर वो घर में चली आई। विक्रम और विवेक तो जैसे मन ही मन में उसके दीवाने होने लगे थे। दोनों रास्ते भर निशा की ही बातें करते रहे थे। उन दोनों ने एक दूसरे के मन की बात समझ ली थी।

वे शाम के ढलते ढलते निशा के यहाँ पहुँच गये थे, बिल्कुल सीधे सादे, शालीन तरीके से … सभ्य तरीके से …।

अपने पति से परिचय करवाते हुये निशा ने बताया- आप राजेश्वर भागवत…मेरे पति.. और आप… विक्रम और विवेक हैं। इन दोनों ने आज मेरी बहुत मदद की थी, इसलिये आज उन दोनों को भोजन पर बुलाया है।

“दोनों अकेले ही आये हो… हमारी भाभियाँ भी साथ आती तो मुझे बहुत अच्छा लगता…” मेरे पति ने कहा।

“जी अगली बार याद रखेंगे… बुलायेंगे ना…?” फिर दोनों ही जोर से हंस पड़े।

“हाँ हाँ जरूर …!” राजेश्वर भी हंस पड़े।

भोजन से निपट कर वे तीनों फ़ार्म भरने में लग गये। राजेश्वर अपनी पहियों वाली कुर्सी पर लुढ़कते हुये अन्दर के कमरे में चले आये। निशा का विषय तो ज्योग्राफ़ी था, उन दोनों ने भी ज्योग्राफ़ी विषय भर दिया। विक्रम और विवेक के विषयों में भी बी ए में ज्योग्राफ़ी भी एक विषय था। एक ही दिन में तीनों की अच्छी जान पहचान हो चुकी थी। साल भर वे तीनों आपस में अक्सर मिला करते थे और आपस में नोटस का आदान-प्रदान करते थे।

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